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डर भी इतना ना हो कि डर का डर निकल जाय

 *खरी - अखरी* 


डर भी इतना ना हो कि डर का डर निकल जाय



*ये कांग्रेस के शाहजादे पिछले पांच साल से सुबह उठते ही माला जपना शुरू करते थे। जबसे उनका राफेल वाला मामला ग्राउंडेड हो गया था तबसे उन्होंने एक नई माला जपना शुरू किया। पांच साल से एक ही माला जपते थे - पांच उद्योगपति, पांच उद्योगपति, पांच उद्योगपति फिर धीरे - धीरे कहने लगे अंबानी - अडानी, अंबानी - अडानी, अंबानी - अडानी । लेकिन जब से चुनाव घोषित हुआ है इन्होने अंबानी - अडानी को गाली देना बंद कर दिया है। शाहजादे घोषित करें कि चुनाव में ये अंबानी - अडानी से कितना माल उठाया है। कालेधन के कितने बोरे भर करके रुपये मारे हैं। क्या टेम्पो भर करके नोटें कांग्रेस के लिए पहुंची है। क्या सौदा हुआ है। आपने रातों-रात अंबानी - अडानी को गाली देना बंद कर दिया। जरूर दाल में कुछ काला है पांच साल तक अंबानी - अडानी को गाली दी और रातों-रात गालियां अब बंद हो गई मतलब कोई न कोई चोरी का माल टेम्पो भर - भर के आपने पाया है।* _यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उस चुनावी रैली में दिए गए भाषण का हिस्सा है जो उन्होंने तेलंगाना में दिया था।_

 

*पीएम मोदी के इस कथन और इसमें इस्तेमाल किए गए अमर्यादित फूहड़ शब्दों को लेकर देशभर में चर्चा हो रही है। राजनीतिक विश्लेषकों और लेखकों, वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा पीएम मोदी द्वारा पहली बार अंबानी - अडानी को सार्वजनिक रुप से वस्त्रहीन किये जाने के पीछे के मायने क्या हैं का पोस्टमार्टम किया जा रहा है। सभी समीक्षकों के मुताबिक इस भाषण की भाषा किसी प्रधानमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद पर बैठे व्यक्ति की ना होकर सड़क छाप मवाली की भाषा से भी गई गुजरी समझ आती है। ऐसा लगता है कि नरेन्द्र मोदी का यह व्यक्तव्य राहुल गांधी की आड़ लेकर अंबानी - अडानी और 144 करोड़ भारतीयों को दी गई धमकी है। वैसे देखा जाए तो पीएम मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी और जबसे प्रधानमंत्री की कुर्सी में बैठे हैं तबसे धमकी युक्त शब्दावली का ही उपयोग कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नरेन्द्र मोदी पीएम की डगमगाती कुर्सी से खुद को इतना असुरक्षित और असहज महसूस करने लग गए हैं कि अब उनकी भाषा से सभ्यता एवं मर्यादा दोनों का लोप होने लगा है। जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री जैसे प्रतिष्ठित पद पर विराजमान होने के लायक नहीं रह गये हैं।*


*देखने में आ रहा है कि देश में दस साल राज करने का सफर नेहरू - गांधी को कोसने से शुरू होकर अंबानी - अडानी को कोसने पर आ गया है। मोदी राज के नये उद्योग (जेल उद्योग) में ही सबका साथ - सबका विकास हो रहा है। चर्चा हो रही है कि देश के दो सबसे बड़े धनाढ्य व्यक्ति अंबानी - अडानी के कालेधन, चोरी के माल का खुलासा जब खुद पीएम मोदी ने कर ही दिया है तो अभी तक अंबानी - अडानी के घर पर न तो ईडी, आईटी का छापा पड़ा न ही उनको जेल भेजा गया। उनके घरों पर अभी तक बुलडोजर क्यों नहीं चला। आखिर पीएम मोदी को किसने रोक रखा है यह सब करने से । देशवासी जानना चाहते हैं। पीएम नरेन्द्र मोदी के मुख से निकली हल्की सी बात पर चौबीसों घंटे कांव - कांंव करने वाले मीडिया घराने भी लगता है सदमे में चले गए हैं या फिर वे दुविधा में पड़ गए हैं कि मोदी के कहे पर कैसे कोई डिबेट चलायें कारण उनका जमीर तो दोनों की चौखट पर कुचला पड़ा है। भई गति सांप छछूंदर केरी, उगलत निगलत पीर घनेरी।*


*तानाशाह को ध्यान रखना चाहिए कि "डर इतना ना हो कि डर का डर निकल जाय" । विश्लेषकों का कहना है कि स्वतंत्र भारत में अब तक हुए आम चुनावों में संभवतः पहली बार कार्पोरेट लूट चुनावी मुद्दा बनकर सामने आई है। चुनावी मुद्दा बने लोकतंत्र, संविधान, आरक्षण ने तो पहले से ही पीएम मोदी और भाजपा की नाक में दम कर रखा है। वरिष्ठ पत्रकारों के मुताबिक तेलंगाना में पीएम नरेन्द्र मोदी ने कालेधन के कोडवर्ड को डिकोट किया है - "टेम्पो"। अंबानी - अडानी को तो यह पहले ही समझ में आ जाना चाहिए था कि जब मोदी अपने राजनीतिक गुरु जिनकी  कृपादृष्टि की बदौलत ही वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंच सके हैं उनको ही अपनी राह का सबसे बड़ा रोड़ा मानते हुए किनारे लगा दिया है तो फिर एक न एक दिन सार्वजनिक रूप से नरेन्द्र मोदी की जुबान पर उनका नाम आयेगा ही आयेगा। "ऐसा कोई सगा नहीं जिसे साहिब ने छला (ठगा) नहीं" ।*


     *विदेशी मीडिया में हो रही थू - थू*


*कहा जा सकता है कि पीएम मोदी को देश के ताने-बाने के बिगड़ने की जरा भी परवाह नहीं है तभी तो वे जनता के मूलभूत मुद्दों को छोड़कर हर घड़ी मुस्लिम, मस्जिद, मुस्लिम लीग, मछली, मंगलसूत्र, भैंस जैसे नफरती मंत्र जप कर देशभर में डर का माहौल बनाने में लगे रहते हैं। हर गुजरते दिन के साथ उनकी भाषा का स्तर गिर कर हद से बेहद पर आ रहा है। लगता है कि मोदी मजबूर हैं कि अगर वे हिन्दुओं और मुसलमानों को डिव्हाइड नहीं करवा पाये तो बीजेपी के पास कुछ नहीं बचेगा । कारण उन्हें हरहाल में जीत चाहिए। भले ही प्रधानमंत्री की शख्सियत पर सवालिया निशान लग रहा है।       विदेशी मीडिया में तो इन्डियन प्राइम मिनिस्टर की तारीफ में जिस तरह के कसीदे पढे़ जा रहे हैं उससे भले ही वे और उनके पिछलग्गू कैबरे कर रहे हों मगर देश और देश का आम नागरिक खुद को शर्मसार महसूस कर रहा है।* 

_ASTRELIEN - NARENDRA MODI KNEW ALLY WAS A MASS RAPIST_    *THE TIMES - NARENDRA MODI KNEW OF RAPE CLAIMS AGAINST ANY PRAJWAL REVENNA*      _HERALD SUN - INDIA PM HAS LINKS TO MASS RAPIST_


*केंचुआ खुद कर रहा आचार संहिता का उल्लंघन !* 


*लगता है कि देश का केंचुआ पूरी तरह से चुनाव से गायब हो गया है। केंचुआ की विश्वसनीयता भी पूरी तरह खत्म हो गई है। संविधान की दुहाई देने वाले चुनावी आयुक्तों का कुनबा पूरी तरह खामोश है। चुनावी आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन राजनीतिक दल तो कर ही रहे हैं यहां तो खुद केंचुआ आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए दिखाई दे रहा है। देखने में आ रहा है कि पीएम मोदी के द्वारा की गई आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें दर शिकायतें मिलने के बाद भी चुनाव आयुक्त मोदी के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। कई राज्यों से जाति विशेष के मतदाताओं को मतदान करने से रोके जाने की खबरें आ रही हैं। इतना ही नहीं खबरें तो यहां तक मिल रही है कि अब भाजपा के कद्दावर नेताओं के खिलाफ चुनाव लड़ने वालों को नामांकन फार्म तक नहीं दिये जा रहे हैं। इन सब बातों को लेकर नागरिकों में खासी नाराजगी है और कहीं - कहीं तो वे केंचुआ को श्रध्दांजलि तक देने लगे हैं।* 


*अदालतें खामोश - मीडिया की बक बंद*


*संविधान के हिसाब से देश को चलाये रखने की जिम्मेदारी सम्हालने वाली अदालतों में भी खामोशी पसरी पड़ी है जबकि उसे स्वसंज्ञान ले लेना चाहिए। देश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि तमाम मशीनरी को दरकिनार कर तीन आयुक्त, दो जजेज और दो नेता मिलकर देश का भविष्य तय कर रहे हैं। पत्रकारिता का मूल धर्म यही है कि वह विपक्ष में रहे क्योंकि पत्रकारिता सत्तापक्ष के लिए स्थाई विपक्ष ही  होती है। भाजपा हो या अन्य पार्टियां सभी धर्म, सम्प्रदाय के नाम पर राजनीति कर रही हैं मगर मीडिया का एक बड़ा तबका भाजपा को लेकर मौन है। मीडिया के इस आचरण को न केवल जनता के साथ विश्वासघात बल्कि देशद्रोह भी कहा जा सकता है । मीडिया का जनता की भावनाओं से खिलवाड़ और नेताओं के साथ गलबहियाँ इसे तो देशभक्ति कतई नहीं कहा जा सकता। मीडिया घरानों ने जिस तरह से बेशर्मी ओढ़कर खुद को निम्नतम स्तर तक गिरा लिया है तो अब यह भी नहीं कहा जा सकता कि सुबह का भूला शाम को घर लौट आ । आ अब लौट चलें ।*


*अश्वनी बडगैया अधिवक्ता* 

_स्वतंत्र पत्रकार_

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