जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना दया नहीं होता, अक्सर वह आदत बन जाती है, जब मेहनत का मूल्य घटता है तो जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है, मनोविज्ञान कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास मिलती है, उसकी कदर नहीं होती, शिक्षा, न्याय और इलाज सहारा हैं, लेकिन मुफ़्तखोरी कमज़ोरी सिखा देती है
जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना दया नहीं होता, अक्सर वह आदत बन जाती है, जब मेहनत का मूल्य घटता है तो जिम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है, मनोविज्ञान कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास मिलती है, उसकी कदर नहीं होती, शिक्षा, न्याय और इलाज सहारा हैं, लेकिन मुफ़्तखोरी कमज़ोरी सिखा देती है संपादक राहुल पाण्डेय | जनता को हर चीज़ मुफ़्त देना पहली नज़र में करुणा और जनहित का प्रतीक लगता है, लेकिन गहराई से देखें तो यह नीति कई बार समाज को मज़बूत करने के बजाय उसे कमज़ोर बना देती है। दया और सशक्तिकरण में बारीक लेकिन बेहद अहम अंतर है। दया वह है जो कठिन समय में सहारा दे, जबकि सशक्तिकरण वह है जो व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होना सिखाए। दुर्भाग्यवश, आज की राजनीति और नीतियों में यह रेखा अक्सर धुंधली होती जा रही है। मनोविज्ञान स्पष्ट रूप से कहता है कि जो चीज़ बिना प्रयास के मिलती है, उसकी कदर नहीं होती। जब मेहनत का मूल्य घटता है, तो ज़िम्मेदारी भी धीरे-धीरे मरने लगती है। व्यक्ति यह मानने लगता है कि राज्य या व्यवस्था हर आवश्यकता अपने आप पूरी कर देगी। इस सोच का सीधा असर कामकाज की नैतिकता, सामाजिक...