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भ्रष्टाचार उस लेवल पर पहुंच चुका है कि बंदा रिश्वत लेकर भी अगर टाइम से काम कर दे तो उसे ईमानदारो की कैटेगरी में गिना जाता है, जब रिश्वत लेकर समय पर काम करना भी ‘ईमानदारी’ कहलाने लगे

 भ्रष्टाचार उस लेवल पर पहुंच चुका है कि बंदा रिश्वत लेकर भी अगर टाइम से काम कर दे तो उसे ईमानदारो की कैटेगरी में गिना जाता है, जब रिश्वत लेकर समय पर काम करना भी ‘ईमानदारी’ कहलाने लगे



कटनी  |  देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा धब्बा यदि किसी एक शब्द में समेटा जाए, तो वह है—भ्रष्टाचार। यह अब कोई छिपी हुई बीमारी नहीं, बल्कि खुलेआम स्वीकार कर ली गई व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। हालत इतनी विकृत हो चुकी है कि यदि कोई अधिकारी रिश्वत लेने के बाद भी समय पर काम कर दे, तो उसे “ईमानदार” की श्रेणी में रख दिया जाता है। यह केवल एक कथन नहीं, बल्कि उस मानसिकता का आईना है जो हमारे तंत्र में गहराई तक जड़ें जमा चुकी है।

एक समय था जब ईमानदारी का अर्थ था निष्पक्षता, पारदर्शिता और कर्तव्यनिष्ठा।लेकिन आज यह परिभाषा बदल चुकी है। अब ईमानदारी का पैमाना गिरकर इतना नीचे आ गया है कि रिश्वत लेना भी “सामान्य” और “व्यवहारिक” माना जाने लगा है। आम नागरिक यह मानकर चल रहा है कि बिना “चाय-पानी” के कोई काम नहीं होगा। यह स्वीकृति ही भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी ताकत है। सरकारी दफ्तरों की तस्वीर किसी से छिपी नहीं। फाइलें धूल खाती रहती हैं, लेकिन जैसे ही नोटों की गड्डी टेबल के नीचे सरकती है, वही फाइल अचानक गति पकड़ लेती है। यह केवल सिस्टम की कमजोरी नहीं, बल्कि नैतिक पतन का चरम है। दुखद यह है कि इस व्यवस्था को अब न तो अधिकारी गलत मानते हैं, न ही आम जनता इसका खुलकर विरोध करती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर हम इस स्थिति तक पहुंचे कैसे? जवाब साफ है जवाबदेही की कमी, सख्त कार्रवाई का अभाव और सामाजिक चुप्पी। जब गलत करने वाले को सजा नहीं मिलती, तो वह गलत धीरे-धीरे नियम बन जाता है। और जब समाज उस नियम को स्वीकार कर लेता है, तो भ्रष्टाचार संस्कृति बन जाता है। आज जरूरत केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि उसे लागू करने की है। पारदर्शिता, डिजिटल प्रक्रियाएं और जनभागीदारी ही इस जड़ जमाए रोग का इलाज बन सकती हैं। साथ ही, समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी रिश्वत देकर काम करवाना “स्मार्टनेस” नहीं, बल्कि व्यवस्था को और खोखला करने का माध्यम है। यदि अब भी हम नहीं चेते, तो वह दिन दूर नहीं जब ईमानदारी एक मजाक बनकर रह जाएगी और भ्रष्टाचार हमारी पहचान। सवाल यह नहीं कि सिस्टम कितना भ्रष्ट है, सवाल यह है कि हम इसे कब तक सहते हैं।

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