देश में LPG की कमी नहीं हैं, बस कभी - कभी युद्ध का बहाना बनाकर महंगाई बढ़ा दी जाती हैं, फिर धीरे - धीरे लोगों को उस बढ़े हुए रेट की आदत बन जाती हैं इसे बोलते हैं राजनीति करके जनता को चूतिया बनाना और उनका खून चूसना, वक्त के साथ सब बदल जाता है, पुराने जमाने में जिसे ठेंगा कहते थे, उसे आज लाइक कहते हैं, क्या हम वाकई हालात के शिकार हैं, या हमें हालात का आदी बना दिया गया है, महंगाई का महायुद्ध और जनता की आदतें
देश में LPG की कमी नहीं हैं, बस कभी - कभी युद्ध का बहाना बनाकर महंगाई बढ़ा दी जाती हैं, फिर धीरे - धीरे लोगों को उस बढ़े हुए रेट की आदत बन जाती हैं इसे बोलते हैं राजनीति करके जनता को चूतिया बनाना और उनका खून चूसना, वक्त के साथ सब बदल जाता है, पुराने जमाने में जिसे ठेंगा कहते थे, उसे आज लाइक कहते हैं, क्या हम वाकई हालात के शिकार हैं, या हमें हालात का आदी बना दिया गया है, महंगाई का महायुद्ध और जनता की आदतें
संपादक राहुल पाण्डेय
देश में LPG की कमी नहीं है।गोदाम भरे हैं, टैंकर चल रहे हैं, सप्लाई चेन दुरुस्त है फिर भी जब-तब अंतरराष्ट्रीय हालात और युद्ध जैसी परिस्थितियों का शोर मचाकर कीमतों में आग लगा दी जाती है। सवाल ये नहीं कि युद्ध होता है या नहीं, सवाल ये है कि हर बार उसकी आंच सीधे आम आदमी की रसोई तक ही क्यों पहुंचती है दरअसल, यह सिर्फ गैस सिलेंडर की कीमत का मामला नहीं है, यह उस मानसिकता का खेल है जिसमें जनता को धीरे-धीरे महंगाई का आदी बना दिया जाता है। पहले दाम बढ़ाओ, फिर कुछ दिन शोर होने दो, फिर वही बढ़ा हुआ दाम “नॉर्मल” बना दो। और जनता? वह मजबूरी में इसे अपनी नियति मान लेती है। यही है असली राजनीति सीधे जेब पर वार करना, और फिर उसी चोट को “परिस्थिति की मजबूरी” बताकर सही ठहराना । जनता हर बार सोचती है कि शायद इस बार हालात सच में गंभीर हैं, लेकिन वक्त बीतते-बीतते वही हालात स्थायी बहाना बन जाते हैं। कभी गौर किया है जब कीमतें बढ़ती हैं तो तर्क बहुत बड़े-बड़े होते हैं अंतरराष्ट्रीय संकट, कच्चे तेल की कीमत, युद्ध, आपूर्ति बाधित लेकिन जब हालात सुधरते हैं, तब वही तर्क गायब क्यों हो जाते हैं? तब कीमतें क्यों नहीं उसी तेजी से नीचे आतीं? असल में खेल सिर्फ अर्थशास्त्र का नहीं, मनोविज्ञान का है। पहले जनता को झटका दो, फिर उसे उस झटके की आदत डाल दो।धीरे-धीरे वही असामान्य चीज सामान्य लगने लगती है। और यही सबसे बड़ा हथियार है आदत। आज का दौर तो और दिलचस्प है। पहले लोग नाराज होते थे, सड़कों पर उतरते थे, सवाल पूछते थे। अब गुस्सा “लाइक” और “कमेंट” में सिमट गया है। पुराने जमाने में जिसे ठेंगा दिखाना कहते थे, आज वही काम सोशल मीडिया पर एक इमोजी कर देता है। सिस्टम भी समझ चुका है कि डिजिटल गुस्सा ज्यादा खतरनाक नहीं होता । जनता भी अब दो हिस्सों में बंट गई है एक वो जो हर बढ़ती कीमत पर सवाल पूछती है, और दूसरी वो जो हर सवाल पूछने वाले को ही गलत साबित करने में जुट जाती है। ऐसे में असली मुद्दा पीछे छूट जाता है, और बहस का केंद्र बदल जाता है। यह व्यंग्य नहीं, हकीकत है कि अब महंगाई खबर कम और आदत ज्यादा बन चुकी है। रसोई का बजट बिगड़ता है, लेकिन बहस टीवी और मोबाइल की स्क्रीन पर ही खत्म हो जाती है। समस्या LPG की नहीं है, समस्या उस सोच की है जिसमें जनता को धीरे-धीरे इतना सहनशील बना दिया जाता है कि वह हर बढ़ोतरी को “चलो, यही सही” कहकर स्वीकार कर लेती है। और जब स्वीकार करने की यह आदत बन जाती है, तब महंगाई सिर्फ आर्थिक नहीं रहती वह एक स्थायी व्यवस्था बन जाती है।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें