अन्नदाता की खामोश ताकत, कड़ाके की ठंड सन्नाटा और आधी रात फिर भी खेत में डटा किसान न शिकायत न बहाना उसकी मेहनत से ही देश का हर घर रोशन और हर थाली भरती हैं वहीं असली प्रेरणा हैं
अन्नदाता की खामोश ताकत, कड़ाके की ठंड सन्नाटा और आधी रात फिर भी खेत में डटा किसान न शिकायत न बहाना उसकी मेहनत से ही देश का हर घर रोशन और हर थाली भरती हैं वहीं असली प्रेरणा हैं
संपादक राहुल पाण्डेय | कड़ाके की ठंड, चारों ओर पसरा सन्नाटा और आधी रात का स्याह अंधेरा इन सबके बीच खेत में डटा किसान किसी दृश्य का हिस्सा नहीं, बल्कि देश की धड़कन है। न उसके होंठों पर शिकायत है, न हालातों को कोसने का बहाना। मौसम की मार, अनिश्चित आमदनी और कठिन श्रम के बावजूद वह चुपचाप अपनी जिम्मेदारी निभाता रहता है। उसकी यह खामोशी कमजोरी नहीं, बल्कि असाधारण धैर्य और संकल्प की पहचान है। जब देश चैन की नींद सोता है, तब किसान की आंखों में अगली फसल के सपने और चिंता साथ-साथ पलते हैं।किसान की मेहनत से ही हर घर में चूल्हा जलता है और हर थाली भरती है। खेतों में बहता उसका पसीना सिर्फ अनाज नहीं उगाता, बल्कि देश की आत्मनिर्भरता को सींचता है। विडंबना यह है कि जिस हाथ से देश का भविष्य लिखा जाता है, वही हाथ अक्सर उपेक्षा का शिकार होता है। संपादकीय दृष्टि से यह समय केवल प्रशंसा का नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का भी है नीतियों में संवेदनशीलता, बाजार में न्याय और समाज में सम्मान सुनिश्चित करने की। वास्तविक प्रेरणा वही है जो बिना शोर किए अपना कर्तव्य निभाए। किसान का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति मंचों पर नहीं, मिट्टी में उतरकर दिखाई देती है। यदि राष्ट्र को मजबूत बनाना है, तो अन्नदाता की मेहनत का मोल सिर्फ शब्दों से नहीं, ठोस समर्थन और सम्मान से चुकाना होगा।

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