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विजेंद्र चौहान के बयान पर उठा विवाद, आलोचना या बहानेबाज़ी

 विजेंद्र चौहान के बयान पर उठा विवाद, आलोचना या बहानेबाज़ी



नई दिल्ली ।  हाल ही में विजेंद्र चौहान द्वारा दिए गए एक बयान ने सोशल मीडिया और बौद्धिक हलकों में नई बहस को जन्म दे दिया है । बयान में आधुनिक तकनीक, विशेषकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित प्लेटफॉर्म्स पर जातिगत पक्षपात का आरोप लगाए जाने के बाद कई विशेषज्ञों और अभ्यर्थियों ने इसे आलोचना से अधिक एक बहाना करार दिया है। आलोचकों का कहना है कि जब तर्क और तथ्य कमजोर पड़ने लगते हैं, तब साज़िश के सिद्धांत गढ़े जाने लगते हैं। पहले सिस्टम को दोषी ठहराया जाता है, फिर समाज को, और अब तकनीक तक को “अपर कास्ट” जैसे आरोपों के दायरे में लाया जा रहा है।जानकारों के अनुसार, तकनीकी प्लेटफॉर्म किसी व्यक्ति की जाति, वर्ग या सामाजिक पृष्ठभूमि नहीं देखते, बल्कि डेटा, लॉजिक और पूछे गए प्रश्नों के आधार पर उत्तर देते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी को किसी सवाल का जवाब संतोषजनक नहीं लगता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि सिस्टम पक्षपाती है। कई बार सवाल की संरचना, तथ्यों की कमी या अपेक्षाओं का अव्यावहारिक होना भी इसका कारण हो सकता है। उनका कहना है कि हर असहमति को “सवर्ण षड्यंत्र” या पूर्वाग्रह का नाम देना बौद्धिक विमर्श को कमजोर करता है। यह मुद्दा विशेष रूप से तब चर्चा में आया जब यूपीएससी मॉक इंटरव्यू जैसे गंभीर और प्रतिस्पर्धी मंचों का उल्लेख किया गया। शिक्षाविदों के अनुसार, ऐसे मंचों पर भावनात्मक आरोपों के बजाय तथ्यात्मक और तार्किक तैयारी की अपेक्षा की जाती है। यदि कोई अभ्यर्थी तर्क की जगह आरोपों का सहारा लेता है, तो यह ज्ञान की नहीं, बल्कि हताशा की पहचान मानी जाती है। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि सिस्टम से सवाल करना और उसमें सुधार की मांग करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन हार या असफलता के बाद मशीन या तकनीक को जातिवादी ठहराना एक आसान, पर कमजोर रास्ता है। स्वस्थ आलोचना और जिम्मेदार आत्ममंथन ही किसी भी व्यवस्था को बेहतर बनाने का माध्यम हो सकता है। फिलहाल, यह बहस तकनीक, समाज और व्यक्तिगत जिम्मेदारी के बीच संतुलन को लेकर एक बड़े विमर्श की ओर इशारा कर रही है, जहां तर्क और तथ्य की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

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