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कटनी पुलिस की संपूर्ण विवेचना घोर उपेक्षा और लापरवाही का ज्वलंत उदाहरण मानकर कोर्ट ने हवाला कांड के सभी आठ आरोपियों को बरी किया अभियुक्तों की हस्तलिपी हस्ताक्षरों का एक्सपर्ट से परीक्षण नहीं कराया, मूल दस्तावेज का विलोपन 56 अभियोजन साक्ष्यों का समर्थन खोखला सिद्ध हुआ कुछ ने पुलिस के सामने दिए कथनों को अस्वीकारा संदीप बर्मन, सतीश सरावगी, मानवेन्द्र मिस्त्री, मनीष सरावगी, दस्सू पटेल, नरेश पोद्दार, नरेश बर्मन, मो. यासीन पर जालसाजी और फर्जी लेनदेन सिद्ध नहीं कर पाई पुलिस

 कटनी पुलिस की संपूर्ण विवेचना घोर उपेक्षा और लापरवाही का ज्वलंत उदाहरण मानकर कोर्ट ने हवाला कांड के सभी आठ आरोपियों को बरी किया

अभियुक्तों की हस्तलिपी हस्ताक्षरों का एक्सपर्ट से परीक्षण नहीं कराया, मूल दस्तावेज का विलोपन

56 अभियोजन साक्ष्यों का समर्थन खोखला सिद्ध हुआ कुछ ने पुलिस के सामने दिए कथनों को अस्वीकारा

संदीप बर्मन, सतीश सरावगी, मानवेन्द्र मिस्त्री, मनीष सरावगी, दस्सू पटेल, नरेश पोद्दार, नरेश बर्मन, मो. यासीन पर जालसाजी और फर्जी लेनदेन सिद्ध नहीं कर पाई पुलिस



कटनी ।  तृतीय अपर सत्र न्यायालय जबलपुर के न्यायाधीश श्रीमान इरशाद अहमद ने कटनी में फर्जी रूप से बनाई गई 16 व्यापारिक फर्मों के फर्जी संचालकों के नाम से फर्जी खाते खोलकर कई सौ करोड़ रूपए के लेनदेन वाले हवाला काण्ड की कटनी पुलिस द्वारा की गई विवेचना को घोर उपेक्षा और लापरवाही का जीवंत उदाहरण करार देते हुए उन सभी आठ आरोपियों पर दोषसिद्धी नहीं पाते हुए उन्हें बाईज्जत बरी कर दिया। जिसमें अदालत ने पूर्व विवेचनाधिकारी टीआई एसपीएस बघेल और बाद में टीआई शैलेष मिश्रा द्वारा अनुसंधान में शुरू से अंत तक की गई लीपापोती को ही आरोप सिद्धी में बाधक मानकर आरोपी संदीप बर्मन, सतीश सरावगी, मानवेन्द्र मिस्त्री, मनीष सरावगी, दस्सू पटेल, नरेश पोद्दार, नरेश बर्मन, मो. यासीन को आरोपमुक्त करने का फैसला सुनाया। चलिए याद करते हैं कि जैसे ही यह हवालाकांड जांच करने के लिए पूर्व एसपी गौरव तिवारी ने टीआई एसपीएस बघेल से जांच शुरू करवाई उसी क्षण शिवराज सरकार ने उन्हें तबादला पर भेजकर विश्वसनीय एसपी शशीकांत शुक्ला को कटनी भेजा, जिन्होंने आते ही कहा था कि यह हवाला नहीं है, बेकार में फैलाया गया रायता है, और देखते ही देखते शुक्ला जी के मार्गदर्शन में पहले टीआई बघेल और उसके बाद टीआई शैलेष मिश्रा ने बगरा हुआ रायता समेट दिया। वर्तमान में शशीकांत शुक्ला अपनी कार्यकुशलता के दम पर भाजपाई शासन से पदोन्नति पाकर डीआईजी पद पर है।*

अभियोजन का संक्षेप सार यह है कि रजनीश तिवारी संजय तिवारी की रिपोर्ट कोतवाली थाने में दर्ज की गई। जिसमें संजय ने उपरोक्त लोगों पर आरोप लगाया था कि उसके पहचान पत्र, पेन कार्ड लेकर एक्सिस बैंक में उसके नाम से फर्जी फर्म एसके मिनरल्स का खाता खोला गया, करोड़ों का लेनदेन होता रहा। उसे कुछ पता नहीं था जब इनकम टैक्स विभाग ने लाखों रूपयों की टैक्स वसूली का नोटिस भेजा तब आईटी आफिस जाने पर उसे जानकारी हुई कि सतीश सरावगी वगैरह ने यह फर्जीबाड़ा और करोड़ों का लेनदेन किया है। तात्कालीन एसपी गौरव तिवारी ने टीआई एसपीएस बघेल को शिकायत की जांच करने का जैसे ही आदेश दिया 48 घंटों के भीतर उनका तबादला हो गया। इस बीच पुलिस ने आठों आरोपियों के खिलाफ ताहि. की धारा 420, 467, 468, 471, 423, 424, 120 बी-34 के तहत एफआईआर दर्ज कर ली।

संजय तिवारी व रजनीश तिवारी की रिपोर्ट पर पुलिस ने पहला चालान 3 अप्रैल 17 को फिर पूरक चालान 11 व 29 मई 17 को कोर्ट में पेश किया था। पुलिस के अभियोजन के अनुसार फरियादियों की अनुमति के बिना उनके कागजात लेकर आरोपियों ने फर्जी फर्मों का संचालन किया था। इन फर्मों में शिव आराधना इंटरप्राइजेज, प्रभु वंदना इं., श्रीलक्ष्मी इं., अंकुर इं., रामा इं., श्वेता इं., मो शारदा इं., हरिओम इं., राधास्वामी इं., व्यापार ट्रेडिंग कं., यूनिक ट्रेडिंग कं., आदिनाथ सर्विसेज, एसके मिनरल्स, श्री मिनरल्स, शुभम ट्रेडिंग, बाहुबली ट्रेडिंग आदि शामिल थींँ इनमें करोड़ों रूपयों का लेनदेन किया जा रहा था। इसके बैंक खाते एक्सिस बैंक, एचडीएफसी और आईसीआईसीआई बैंक में खोले गए थे।

*लोडर में जब्त 24 बोरे  दस्तावेजों का परीक्षण नहीं*

अभियोजन के अनुसार 06.01.2017 को सतीश सरावगी अपने नदी पार स्थित शाला से एक लोडर गाड़ी क्र. एमपी 21 एम 0522 पर इन फर्मों के कागजातों को बोरियों में भरकर साक्ष्य विलोपन के लिए ले जा हा था, उसे पुलिस टीआई बघेल ने जब्त किया था। अदालत ने लिखा कि बाद में रजनीश-संजय तिवारी के साथ सतीश सरावगी, मो. यासीन, मानवेन्द्र, मनीष, नरेन्द्र पोद्दार, नरेश बर्मन ने एक राजीनामा कोर्ट में पेश किया जिसके आधार पर उन्हें 420, 423, 424, 120-बी से दोषमुक्त किया गया। इसी राजीनामे के आधार पर टीआई शैलेष मिश्रा ने जब्तशुदा बोरों में भरे दस्तावेज सतीश सरावगी की सुपुर्दगी में दे दिए। टीआई द्वय बघेल और मिश्रा ने इन दस्तावेजों का परीक्षण और हस्ताक्षरों का प्रमाणीकरण हस्तलिपी एक्सपर्ट से नहीं कराया था।

इसी दौरान विनय जैन की शिकायत पर 13.07.16 को 420, 467, 468, 471 के तहत सतीश, नरेश बर्मन, दस्सू पटेल के विरूद्ध भी अभियोग पाया गया कि लक्ष्मी इंटरप्राइजेज, बाहुबली ट्रेडिंग, प्रभु वंदना इं., व्यापार ट्रेडिंग कंपनी का 2.17 करोड़ का लेनदेन किया। गैर पंजीकृत महादेव कंपनी में लेनदेन किया गया। इस आरोप पत्र पर जेएमएफसी कटनी की कोर्ट में राजीनामा स्वीकार होने से आरोपी दोषमुक्त हुए। लीडर से प्राप्त दस्तावेज जो साक्ष्य मिटाने के आरोप में जब्त थे, उन्हें डीजे कोर्ट कटनी में आरोपियों को दिए जाने में टीआई शैलेष मिश्रा ने सहमति दी तो वे उनकी सुपुर्दगी में दे दिए गए थे।

*रिवीजन में अभियोजन खारिज*

20 नवंबर 18 सतीश सरावगी ने एक क्रिमिनल रिवीजन दायर किया कि पुलिस की चार्जशीट में कहीं भी उनका संबंध नहीं दर्शित होता कि रजनीश और उसकी फर्म एसके मिनरल्स से उन्होंने कोई बैंकिंग लेनदेन किया है। कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया जिस पर हाईकोर्ट ने यथास्थिति का आदेश दिया था। इसके बाद ईडी ने संज्ञान लिया तो यह केस पीएम एलए कोर्ट में गया। कोर्ट ने सुनवाई के बाद फैसला दिया कि जालसाजी और धोखाधड़ी मूलत: साक्ष्य के विषय हैं। जिन्हें प्रत्यक्ष साक्ष्य अथवा प्रमाणित तथ्यों से निकाले गए अनुमानों के आधार पर सिद्ध किया जा सकता है। वर्तमान मामले में विचारण कोर्ट ने कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया है कि प्रतिवादियों किसी झूठे दस्तावेज का निर्माण किया हो, अत: इस कोर्ट को अभियुक्तों के दोषमुक्त होने पर उसने हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं पाया जाता।

*समझौता आरोप मुक्त के बाद के प्रश्न*

आवेदकों से समझौता के बाद आरोपमुक्त हुए सतीश सरावगी वगैरह की भूमिका पर विचारणीय प्रश्न थे कि संदीप, सतीश, मनीष, नरेश ने क्या फर्जी खातों में हस्ताक्षर किए, उनके (संजय-रजनीश) के दस्तावेज उपयोग किए, लेनदेन किया, आपराधिक षडय़ंत्र किया, बैंकों में जाली खाते खोले, क्या सतीश ने साक्ष्य विलोपन कर दस्तावेज लीडर से हटवाए।

*एक के बाद एक सभी गवाह हुए पक्ष विरोधी*

अदालत में अभियोजन के प्रमुख और सहायक 56 गवाह एक-एक करके पक्ष विरोधी होते चले गए और पुलिस का अभियोजन ध्वस्त हो गया। रजनीश-संजय तिवारी ने स्वीकार कर लिया कि बैंक खाते के सभी दस्तावेज पर्चियों में उसके हस्ताक्षर थे। टीआई बघेल ने मानवेन्द्र के घर से विभिन्न फर्मों के खातों की छायाप्रति, रजिस्टर जब्त किए, आरोपी की लिखावट के कागज जब्त किए तो 18 करोड़ से ऊपर का लेनदेन सामने आया। रजनीश ने माना कि उसे कमीशन के रूप में 30 से 40 हजार रूपए मिलता था। सभी ने पुलिस के सामने दिए गए कथनों से इंकार कर दिया। संजय तिवारी ने भी चार्जशीट को ध्वस्त करते हुए कहा कि वह स्वयं का व्यापार कर रहा था। स्वयं खाते खुलवाए थे। जगबंधु मेहरा, पप्पू प्रहलाद अग्रवाल सहित बैंक के कर्मचारी सबके बयानों से आरोपियों का बैंकों से विवादित लेनदेन प्रमाणित नहीं हुआ।

*पुलिस ने मानी अपनी अधूरी विवेचना*

कोर्ट में प्रति परीक्षण के दौरान आईओ टीआई बघेल ने स्वीकार किया कि उसके एफआईआर करते समय रजनीश से कोई पूछताछ नहीं की, उसके हस्ताक्षर नहीं लिए, न ही उसे पढक़र सुनाया। टीआई बघेल ने माना कि उसने सियाराम मिनरल्स, मनोज मिश्रा से कंपनियों के बारे में पूछताछ नहीं की, पड़ोसियों के बयान भी नहीं लिए। कई फर्मों के खाते के संबंध में दस्तावेजों के संबंध में अभियुक्तों की संबंधता पर कोई जांच-पड़ताल नहीं की। किसी भी फर्म के खातों का उसने क्या संबंध है, इस पर भी पड़ताल नहीं की है। ओवर रायटिंग का भी परीक्षण नहीं कराया है। कोर्ट ने लिखा कि स्पष्ट है कि अभियोजन द्वारा सभी अभियुक्तों की हस्तलिपी व हस्ताक्षर परीक्षण के लिए भेजे ही नहीं गए। मानवेंद्र के बैंक खातों के विवादित हस्ताक्षर हस्तलिपी का पूर्ण मिलान नहीं कराया गया है। इसकी पुष्टि दस्तावेज परीक्षक ने भी की है।

*कोर्ट ने गिनाई अभियोजन की खामियां*

न्यायालय ने फैसले में अभियोजन की गलतियों का पूरा पहाड़ा ही सामने लाकर रख दिया कि कैसे पुलिस ने सभी आरोपियों की हस्तलिपी और हस्ताक्षर परीक्षण नहीं भेजे, यह गंभीर विसंगति है। फरियादी की लिखावट की जांच नहीं कराई।बैंक पर्चियों के लेख सारवान साक्ष्य से प्रमाणित नहीं किया। टीआई शैलेष मिश्रा ने डीजे कोर्ट में लिखकर दिया है कि राजीनामे के पश्चात आधीनस्थ कोर्ट के अनुसार जब्त 24 बोरी दस्तावेज सतीश सरावगी को सुपुर्द करने में पुलिस को कोई आपत्ति नहीं है। पुलिस की पेन ड्राइव में भी जब्त कागजात नहीं मिले। इसलिए अदालत ने माना कि अभियोजन द्वारा आवश्यक न होने के आधार पर जब्त दस्तावेजों की सुपुर्दगी देना और पेन ड्राइव में कागज का नहीं होने से साक्ष्य विलोपन का आरोप स्वत: अप्रमाणित हो गया है। अभियोजन के गवाह अपने बयानों से मुकर गए। इस प्रकार सतीश सरावगी पर साक्ष्य मिटाने का आरोप भी अभियोजन सिद्ध नहीं कर सका है। अभियोजन सिर्फ यह कह रहा है कि खातों में राशियों का लेनदेन हुआ है पर वह प्रमाणित करने में असफल है। प्रकरण में पुलिस द्वारा की गई उपेक्षा और लापरवाही का ज्वलंत उदाहरण जब्त दस्तावेजों के हस्ताक्षर हस्तलिपी का विशेषज्ञ से परीक्षण व प्रमाणीकरण नहीं कराना है।

*थाना प्रभारी का आचरण घातक*

अंत में कोर्ट ने अत्यंत तल्ख टिप्पणी की है कि सभी परिस्थितियां और दोनों टीआई (बघेल/मिश्रा) की अनुसंधान में घोर उपेक्षा है। थाना प्रभारियों का ऐसा आचरण ऐसे महत्वपूर्ण अपराध के अनुसंधान में पूर्णत: शिथिलता और अक्षमता दर्शाते हुए कार्य करना न्याय प्रशासन के लिए घातक है। अभियोजन के साक्षी कथनों में तात्विक विरोधाभास है। अत: आरोपी संदेह का लाभ पाने के अधिकारी हैं। जब तक वैध साक्ष्य तथा अभिलेख की विषय वस्तु के आधार पर शंका से परे दोषसिद्ध नहीं होता तब तक किसी को दंडित नहीं किया जा सकता।

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