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अमीर मांगे तो डोनेशन, सरकार मांगे तो GST, गरीब मांगे तो भीख और न्याय मांगे तो तारीख पर तारीख व्यवस्था पर एक गहरी पड़ताल

 अमीर मांगे तो डोनेशन, सरकार मांगे तो GST, गरीब मांगे तो भीख और न्याय मांगे तो तारीख पर तारीख व्यवस्था पर एक गहरी पड़ताल



कटनी  |  भारत एक ऐसा देश है जहाँ विविधता, संस्कृति और लोकतंत्र की नींव बहुत मजबूत दिखाई देती है, लेकिन इसी देश की व्यवस्था अक्सर लोगों के अनुभवों से कहीं अधिक उलझी, जटिल और असंतुलित नजर आती है। समाज के हर वर्ग की जरूरतें अलग हैं, लेकिन इन जरूरतों के पूरे होने का तरीका और उनके प्रति व्यवस्था का रवैया भी उतना ही भिन्न है।

 *अमीर मांगे तो डोनेशन: दान या अवसरवाद?*

भारतीय समाज में अमीर वर्ग की मांगे या आवश्यकताएँ अक्सर “दान” या “डोनेशन” के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। बड़ी कंपनियों, उद्योगपतियों और हाई प्रोफाइल संस्थानों को जब सहायता या रियायत चाहिए होती है, तो उसे "योगदान" कहकर सम्मान दिया जाता है।

उदाहरण के तौर पर, कॉर्पोरेट घराने अपनी टैक्स छूट वाली गतिविधियों को CSR के नाम पर दान कहते हैं। चुनावी चंदे और राजनीतिक फंडिंग को भी “डोनेशन” ही कहा जाता है।किसी उद्योगपति को राहत चाहिए तो उसे पैकेज या नीति सुधार का नाम दिया जाता है।यहाँ सवाल यह नहीं कि अमीर दान क्यों देते हैं सवाल यह है कि उनकी हर आर्थिक गतिविधि को सम्मानजनक शब्दों में क्यों ढाल दिया जाता है? वही काम यदि कोई साधारण व्यक्ति करे तो वह मदद मांग रहा होता है, लेकिन अमीर करे तो वह "योगदान" कर रहा होता है। समाज में आर्थिक ताकत के साथ सम्मान और स्वीकार्यता भी जुड़ जाती है। यही विषमता इस पंक्ति की पहली कड़ी बनाती है।

*सरकार मांगे तो GST नियम जनता के लिए ही क्यों कठोर?*

2017 में लागू हुआ GST भारत की टैक्स व्यवस्था में सबसे बड़ा बदलाव था। इसका उद्देश्य कर प्रणाली को सरल बनाना था, लेकिन व्यवहारिकता में यह आम नागरिक से लेकर छोटे व्यापारियों तक सभी के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। बिल लो, रिटर्न भरो, पोर्टल से जूझो, समय सीमा का पालन करो ये सब उस आम आदमी से अपेक्षित है जो रोज़मर्रा की कमाई में ही मशगूल है। चूक हो जाए तो भारी जुर्माना और ब्याज। सरकार की नजर में यह "व्यवस्था का सुधार" है, लेकिन आम नागरिक की नजर में यह दायित्वों का बोझ है। जहाँ अमीर अपने टैक्स प्लानिंग के लिए कंसल्टेंट रख लेते हैं, वहीं आम दुकानदार स्वयं ही कानून समझने को मजबूर है।इसलिए जब सरकार मांगे तो वह “GST” है अर्थात नियमों और दायित्वों से बंधा हुआ टैक्स, जिसे चुकाना आपकी मजबूरी है, चाहे आप सहमत हों या नहीं।

 *गरीब मांगे तो भीख जरूरत को अपराध जैसा क्यों माना जाता है?*

गरीबी अपने आप में कोई अपराध नहीं है, लेकिन समाज में गरीबी को जिस नजर से देखा जाता है, वह असमानता को और गहरा कर देता है। जब गरीब व्यक्ति सहायता मांगता है, तो उसे “भीख मांगना” कहकर अवमानना की दृष्टि से देखा जाता है। उसे सहानुभूति से अधिक संदेह मिलता है। उसे इज्जत से अधिक तिरस्कार मिलता है। उसकी गरीबी को उसकी ही गलती माना जाता है। यही वह विडंबना है जहाँ अमीर व्यक्ति सहायता ले तो वह "फाइनेंशियल ग्रांट" कहलाती है, लेकिन गरीब ले तो “भिक्षावृत्ति” गरीब की जरूरत के पीछे असली कारण शिक्षा की कमी, संसाधनों की अनुपलब्धता और व्यवस्था की कमजोरियाँ हैं, लेकिन समाज इन तथ्यों को अनदेखा कर देता है। यह वर्गीय विभाजन हमें बताता है कि जरूरत की भाषा तक हमारे देश में समान नहीं है।

*न्याय मांगे तो तारीख पर तारीख न्याय प्रणाली की धीमी चाल*

बॉलीवुड की मशहूर पंक्ति “तारीख पर तारीख” फिल्मों तक ही सीमित नहीं है यह भारतीय न्याय व्यवस्था की सच्चाई है। न्यायिक प्रक्रिया में देरी आज भी सबसे बड़ी समस्या है। छोटे मामलों को 5–10 साल जमीन से जुड़े मामलों को 15–20 साल और गंभीर अपराधों को कई बार 25–30 साल तक लग जाते हैं। न्याय मिलने में देरी का अर्थ है न्याय का आधा खो देना। लोग अदालतों के चक्कर लगाते रहते हैं, फाइलें बढ़ती रहती हैं, तारीखें बदलती रहती हैं लेकिन फैसला किसी की प्राथमिकता नहीं बन पाता। जहाँ अमीर महंगे वकीलों और नेटवर्क के सहारे तेजी से अपनी बात आगे बढ़वा लेते हैं, वहीं साधारण नागरिक को सालों इंतजार करना पड़ता है। इसलिए जब आम आदमी न्याय मांगता है, तो उसे न्याय नहीं, सिर्फ तारीख ही मिलती है।

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