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भारत की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत, अंतिम पंक्ति के बच्चे तक पहुँचाना होगा सीखने का नया मॉडल

 भारत की शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की जरूरत, अंतिम पंक्ति के बच्चे तक पहुँचाना होगा सीखने का नया मॉडल



कटनी  |  देश में शिक्षा सुधार को लेकर एक बार फिर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब ऐसी नवाचार आधारित और विकसित शिक्षा प्रणाली की ज़रूरत है, जो कक्षा में सबसे पीछे बैठने वाले उस बच्चे तक पहुँचे, जिसकी आवाज़ अक्सर अनसुनी रह जाती है। शिक्षा जगत में यह चिंता लगातार बढ़ रही है कि यदि सीखने का माहौल और तकनीक बच्चों की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप नहीं बदली गई, तो देश को आने वाले समय में एक बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ेगा। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अभी भी पुरानी पद्धतियों के जाल में उलझी दिखाई देती है। कागज़ों पर अंक और प्रतिशत को ही योग्यता का पैमाना बना दिया गया है, जबकि बच्चों की रुचि, उनकी समझ और उनकी गति के आधार पर शिक्षा देने की व्यवस्था काफी कमजोर है। यही कारण है कि कुछ चुनिंदा छात्र तो अव्वल आते हैं, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चे पीछे छूट जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वह भीड़ है, जिसे आगे चलकर छोटी नौकरियों के लिए भी लंबी कतारों में संघर्ष करना पड़ता है।शिक्षा क्षेत्र से जुड़े अनुभवी व्यक्तियों के अनुसार अब समय आ गया है कि देश कौशल विकास, व्यावहारिक ज्ञान, समस्या - समाधान क्षमता, रचनात्मकता और प्रयोग आधारित सीखने को प्राथमिकता दे। तकनीक आधारित अध्ययन, डिजिटल कक्षाएँ, छोटे-छोटे स्तरों पर आधारित सीखने की पद्धति, तथा बच्चों की मानसिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए अध्यापन की नई व्यवस्था अपनाने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि जब तक शिक्षा को किताबों और अंकों से बाहर निकालकर वास्तविक जीवन से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक बच्चे आत्मविश्वास और क्षमता के साथ आगे नहीं बढ़ पाएंगे।ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है। कई स्कूल अभी भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं।शिक्षक-प्रशिक्षण, डिजिटल साधन और नवीन शिक्षण पद्धतियों की कमी के चलते बच्चे अपनी क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि देश को सचमुच विश्व-स्तर की शिक्षा व्यवस्था बनानी है, तो सबसे पहले इन क्षेत्रों में निवेश और सुधार आवश्यक है। शिक्षा मनोवैज्ञानिकों ने भी बच्चों पर अनावश्यक दबाव को हटाने, तनाव कम करने और सीखने को आनंददायक बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया है। उनका कहना है कि बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार किया जाए जहाँ वे अपनी गति और अपनी योग्यता के अनुसार सीख सकें। खेल आधारित शिक्षण, सरल मॉड्यूल, व्यक्तिगत मार्गदर्शन और सकारात्मक माहौल इसके लिए अत्यंत आवश्यक माने जा रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि देश आज भी पुरानी शिक्षा प्रणाली में उलझा रहा, तो आगे चलकर केवल कुछ चुनिंदा छात्रों की सफलता ही देश की तस्वीर बन जाएगी और लाखों बच्चों का भविष्य एक अनिश्चित भीड़ में खो जाएगा। ऐसे में सरकार, शिक्षण संस्थान और समाज को मिलकर एक नई, सर्वसमावेशी और व्यवहारिक शिक्षा व्यवस्था तैयार करने की आवश्यकता है।

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