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बरसाती रातों में भीगती पुलिस क्या राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, सांसद, विधायक ऐसे घर में रह पाएंगे, टपकती छत, गिरने को तैयार छप्पर लेकिन सुरक्षा देने वाली पुलिस को मिला बदहाल आशियाना

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कटनी  |  क्षेत्र में कानून-व्यवस्था संभालने वाली, जनता की सुरक्षा के लिए चौबीसों घंटे मुस्तैद रहने वाली पुलिस आज खुद बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीने को मजबूर है। सवाल उठता है क्या देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या फिर किसी भी जनप्रतिनिधि जैसे सांसद और विधायक इस हाल में एक रात भी गुजार पाएंगे? जिस हाल में पुलिस रहती है, वही हाल अगर किसी वीआईपी को सहना पड़े तो शायद व्यवस्था हिल जाए, लेकिन पुलिस के हिस्से सिर्फ मजबूरी, चुप्पी और जिम्मेदारियों का बोझ आया है। पुलिसकर्मियों को वह सरकारी आवास मिला है जिसमें बरसात में छत से टपटप पानी टपकता है। कई जगह दीवारें सीलन से काली पड़ चुकी हैं, खपरैल और छप्पर ऐसे हाल में हैं कि मामूली आंधी चले तो गिरने का डर बना रहता है। कमरे में न तो सुरक्षित रहने की व्यवस्था है और न ही परिवार लेकर रहने की। कई जवान इन हालात में रात भर ड्यूटी भी करते हैं और उसी भीगे कमरे में सोकर अगली सुबह फिर आम नागरिकों की सुरक्षा के लिए निकल जाते हैं। क्षेत्र के लोग भी स्वीकारते हैं कि पुलिस ने पिछले महीनों में शांति-व्यवस्था बनाए रखने में अद्भुत भूमिका निभाई है। चोरियों, विवादों और अपराधों पर सख्ती से कार्रवाई कर माहौल शांत रखा है। लेकिन बदले में उन्हें मिला क्या? टूटी खिड़कियाँ, जर्जर दीवारें और बरसात में टपकने वाली छत।स्थानीय लोगों का कहना है कि शासन-प्रशासन को इस ओर तुरंत ध्यान देना चाहिए। जो पुलिस हर परिस्थिति में क्षेत्र को सुरक्षित रखती है, वह खुद असुरक्षित घरों में रह रही है यह विडंबना भी है और चिंता का विषय भी। कई पुलिसकर्मियों ने बताया कि वे मजबूरी में इन जर्जर क्वार्टरों में रह रहे हैं, क्योंकि विकल्प नहीं है। प्रशासन की ओर से भी अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। पुलिस विभाग में आवास सुधार को लेकर प्रस्ताव तो बनते हैं, लेकिन अनुमोदन और कार्यान्वयन वर्षों तक लटके रहते हैं। जबकि जमीनी सच्चाई यह है कि कई क्वार्टर किसी भी समय हादसे की वजह बन सकते हैं।अब जनता यह सवाल उठा रही है “जो लोग हमारी सुरक्षा का सबसे बड़ा सहारा हैं, क्या उन्हें रहने के लिए एक सुरक्षित छत भी नहीं मिलनी चाहिए?” समाज और शासन के बीच यह उम्मीद बनती है कि पुलिसकर्मियों के आवास जल्द सुगठित, सुरक्षित और मानवीय मानकों पर तैयार किए जाएँ। क्योंकि अगर शांति और सुरक्षा की रीढ़ कहे जाने वाले पुलिसकर्मी ही बदहाल रहेंगे, तो यह व्यवस्था पर सबसे बड़ा प्रश्नचिह्न है।

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