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ढीमरखेड़ा में शिक्षा विभाग पर सवाल, डीईओ – जेडी की मिलीभगत से बीईओ बदलने का खेल तेज, पैसों और नेतागिरी ने तोड़ी व्यवस्था की रीढ़

 ढीमरखेड़ा में शिक्षा विभाग पर सवाल, डीईओ – जेडी की मिलीभगत से बीईओ बदलने का खेल तेज, पैसों और नेतागिरी ने तोड़ी व्यवस्था की रीढ़



कटनी  |  विकासखंड ढीमरखेड़ा में शिक्षा व्यवस्था इन दिनों अपने सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रही है। जिस विभाग का उद्देश्य बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना है, वहीं विभागीय अफसरों की कथित मिलीभगत, नेतागिरी और पैसों के खेल ने संपूर्ण तंत्र को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।स्थानीय स्रोतों के अनुसार, जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) और संयुक्त संचालक (जेडी) स्तर पर प्रभावशाली लोगों की मिलीभगत से बीईओ (ब्लॉक शिक्षा अधिकारी) की कुर्सी आए दिन बदल रही है । यह परिवर्तन किसी व्यवस्था सुधार का हिस्सा न होकर, कथित रूप से पैसों की ताकत और राजनीतिक उठापटक का परिणाम प्रतीत होता हैं ।  ढीमरखेड़ा में पिछले कुछ समय में बीईओ की नियुक्ति और तबादला किसी सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया की तरह नहीं, बल्कि एक सिस्टमेटिक ट्रेड की तरह चल रहा है, जहां हर कुर्सी का एक भाव तय होने की चर्चा आम है। विभाग के भीतर बैठे कुछ बाबूओं पर आरोप है कि वे डीईओ – जेडी तक पैसा पहुंचाने की भूमिका निभाते हैं, जिसके बदले अधिकारी मनचाही जगहों पर पोस्टिंग और तबादले करने में संकोच नहीं करते । एक सरकारी अधिकारी का बार-बार बदला जाना न केवल विभाग के सम्मान को ठेस पहुंचाता है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर असर डालता है ।

*बार-बार तबादलों से शिक्षा व्यवस्था चरमराई*

ढीमरखेड़ा में बीईओ की कुर्सी इतनी अस्थिर हो चुकी है कि कोई भी अधिकारी अपने काम को गति नहीं दे पा रहा। स्कूल निरीक्षण, शिक्षकों की मॉनिटरिंग, विद्यालय संचालन, बच्चों की उपस्थिति, मिड-डे मील व्यवस्था, शिक्षण-सामग्री की आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण कार्य ठप पड़ जाते हैं। जब एक बीईओ कुछ महीने ही टिक पाता है, तो नीतियों का क्रियान्वयन अधर में लटक जाता है।अधिकारियों के लगातार बदलने से शिक्षक भी असमंजस में रहते हैं कि कौन सा निर्देश लागू रहेगा और कौन सा बदल जाएगा। परिणामस्वरूप, शिक्षा व्यवस्था में अनुशासन बिगड़ता जा रहा है और स्कूलों की दशा सुधारने के बजाय और जटिल होती जा रही है। स्थानीय शिक्षकों का कहना है कि “जब बीईओ को भी पता हो कि उसकी कुर्सी पैसों और राजनीति पर टिकी है, तो वह भी सिस्टम को सुधारने के बजाय खुद को बचाने में ज्यादा ध्यान देता है। ऐसे में सरकारी स्कूलों की स्थिति कैसे सुधरेगी?”

*नेतागिरी और राजनीतिक हस्तक्षेप ने किया माहौल खराब*

ढीमरखेड़ा में छोटे-बड़े नेताओं और उनके समर्थकों का शिक्षा विभाग में दखल लगातार बढ़ता जा रहा है। कुछ छुटभैया नेताओं की पहुंच डीईओ और जेडी स्तर तक होने की चर्चा है। वे अपने खास शिक्षकों को लाभ दिलाने, मनमानी पोस्टिंग कराने और अनुशासनात्मक मामलों को दबाने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं। यहां तक कि कई मामलों में देखा गया है कि कुछ शिक्षक स्वयं को नेता समझकर स्कूल की बजाय राजनीतिक जुगाड़ में ज्यादा समय बिताने लगे हैं। जब शिक्षण जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में नेतागिरी का प्रभाव बढ़ जाता है, तो इसका नुकसान उन छात्रों को उठाना पड़ता है जो सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं ।

*बाबूओं की भूमिका संदिग्ध फाइलें तभी आगे बढ़ती हैं जब लक्ष्मी पहुंचती हैं*

विभागीय बाबू लंबे समय से इस कथित खेल के केंद्र में बने हुए हैं। प्रत्येक फाइल की गति बाबूओं की मर्जी और कथित लेन-देन पर निर्भर होने की बातें सामने आती रहती हैं। फाइल आगे बढ़ाने, जांच रिपोर्ट तैयार करने, निलंबन या पदस्थापना प्रस्ताव तैयार करने, तबादला फाइलें भेजने – लाने जैसे विभागीय कार्यों में वही बाबू सक्रिय बताए जाते हैं जो बाहर से आने वाले पैसों की व्यवस्था सुनिश्चित करते हैं। यही कारण है कि कई बार योग्य अधिकारी भी इस तंत्र के आगे बेबस महसूस करते हैं, जबकि गलत प्रवृत्ति वाले लोग व्यवस्था को मनमुताबिक मोड़ लेते हैं।

*शिक्षा को पीछे धकेलता यह व्यापार*

जब एक बीईओ की पोस्टिंग ही सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले को मिलती नजर आए, तब शिक्षा जैसे आदर्शवादी क्षेत्र में भ्रष्टाचार की पैठ को समझना मुश्किल नहीं है। इस खेल में बच्चों का भविष्य दांव पर है गुणवत्तापूर्ण शिक्षा बाधित हो रही है। निरीक्षण और निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है।सरकारी योजना का सही लाभ छात्रों तक नहीं पहुंच पा रहा।शिक्षक मनमानी बढ़ती जा रही है। विद्यालयों में उपस्थिति और परिणाम दोनों प्रभावित हो रहे हैं। ढीमरखेड़ा की शिक्षा व्यवस्था आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब, ग्रामीण और वंचित परिवारों के बच्चों को हो रहा है जो अपने भविष्य की उम्मीद सरकारी स्कूलों से जोड़ते हैं।

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