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तहसीलदार के नियमों की उड़ रही धज्जियां, श्मशान भूमि पर हुआ निर्माण, प्रशासन बना मूकदर्शक, ग्राम पंचायत झिन्ना पिपरिया के श्मशान घाट में रात में हो गया लेंटर, नियमों की अनदेखी, शासकीय भूमि को होना चाहिए कब्जामुक्त, चलना चाहिए बुल्डोजर

 तहसीलदार के नियमों की उड़ रही धज्जियां, श्मशान भूमि पर हुआ निर्माण, प्रशासन बना मूकदर्शक, ग्राम पंचायत झिन्ना पिपरिया के श्मशान घाट में रात में हो गया लेंटर, नियमों की अनदेखी, शासकीय भूमि को होना चाहिए कब्जामुक्त, चलना चाहिए बुल्डोजर 



ढीमरखेड़ा  |  कानून और नियमों की रक्षक कही जाने वाली तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर अब सवाल उठने लगे हैं। ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है ग्राम पंचायत झिन्ना पिपरिया का, जहाँ श्मशान घाट की भूमि पर अवैध निर्माण कर लिया गया है। यह निर्माण किसी आम व्यक्ति ने नहीं बल्कि ग्राम की ही माया बाई दमोदर सोनी द्वारा किया गया है। हैरानी की बात तो यह है कि इस भूमि पर पहले से ही तहसीलदार द्वारा स्टे आदेश दिया गया था, फिर भी नियमों को ताक पर रखकर सरकारी जमीन पर लेंटर डालकर पक्का निर्माण कर लिया गया। यह मामला प्रशासनिक लापरवाही की पराकाष्ठा को दर्शाता है। जब एक आम नागरिक शासकीय भूमि पर कब्जा करता है तो तुरंत पुलिस और राजस्व अमला कार्रवाई के लिए सक्रिय हो जाता है, मगर जब मामला प्रभावशाली या जुड़ा हुआ व्यक्ति का होता है, तो सिस्टम मौन हो जाता है। यही इस प्रकरण में हुआ है।

 *शासकीय भूमि पर अवैध कब्जा*

प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पंचायत झिन्ना पिपरिया की खसरा नंबर 34, रकवा 0.70 हेक्टेयर की भूमि शासकीय रिकॉर्ड में श्मशान घाट के रूप में दर्ज है। यह भूमि ग्रामीणों के अंतिम संस्कार हेतु निर्धारित है। इसके बावजूद माया बाई दमोदर सोनी ने इस भूमि पर कब्जा करते हुए पक्के मकान का लेंटर डाल दिया। प्रशासन के पास इसकी जानकारी होने के बावजूद कोई रोकथाम नहीं की गई।

 *स्टे आदेश की अनदेखी*

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस भूमि पर पहले ही तहसीलदार द्वारा स्टे आदेश जारी किया गया था। स्टे का अर्थ ही होता है कि उस भूमि पर किसी प्रकार का निर्माण, कब्जा या विक्रय नहीं किया जा सकता। लेकिन जब खुद तहसील प्रशासन के आदेशों का पालन नहीं होता, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि फिर आम जनता के लिए नियमों का क्या मतलब रह गया?

*प्रशासन की भूमिका संदिग्ध*

ऐसे मामलों में तहसील और राजस्व विभाग की जिम्मेदारी होती है कि शासकीय भूमि को कब्जा मुक्त कराई जाए। लेकिन इस प्रकरण में ऐसा नहीं हुआ। इससे यह संदेह भी गहराता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक मिलीभगत से यह अवैध निर्माण हुआ है। यदि समय रहते कार्रवाई की जाती, तो आज श्मशान भूमि पर मकान न बनता।

 *ग्रामीणों में आक्रोश*

इस अवैध कब्जे को लेकर ग्रामवासियों में गहरा रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि श्मशान घाट जैसी पवित्र भूमि पर निर्माण होना धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से अनुचित है। लोग प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि अवैध निर्माण पर बुल्डोज़र चलाया जाए और शासकीय भूमि को कब्जामुक्त कराकर पुनः श्मशान घाट के रूप में बहाल किया जाए।

 *क्या कहते हैं प्रावधान*

भारतीय दंड संहिता एवं भू-राजस्व संहिता के अनुसार, किसी भी व्यक्ति द्वारा शासकीय भूमि पर कब्जा करना अपराध की श्रेणी में आता है। मध्यप्रदेश भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के अंतर्गत ऐसे कब्जे को अवैध घोषित कर भूमि को तत्काल कब्जामुक्त कराने का प्रावधान है। धारा 250 के तहत कब्जाधारी पर जुर्माना और संपत्ति ध्वस्त करने की कार्रवाई की जा सकती है। इसके बावजूद झिन्ना पिपरिया का यह मामला दर्शाता है कि कानून केवल कागज़ों तक सीमित रह गया है।

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