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रूपनाथ का झरना, प्रकृति की गोद में एक अलौकिक अनुभव, प्रकृति की पहली झलक

 रूपनाथ का झरना, प्रकृति की गोद में एक अलौकिक अनुभव, प्रकृति की पहली झलक



कटनी  |  दैनिक ताजा खबर के प्रधान संपादक राहुल पाण्डेय जब रूपनाथ की धरती पर पहुँचे, तो उनके मन में केवल एक ही जिज्ञासा थी आखिर वह कौन-सा आकर्षण है जो इस स्थान को केवल एक जलप्रपात नहीं, बल्कि आत्मा की शांति का केन्द्र बना देता है? जैसे ही उन्होंने झरने की ओर कदम बढ़ाए, चारों ओर फैली हरियाली, पक्षियों की चहचहाहट, और ठंडी हवा के झोंके ने उनका स्वागत किया। सामने बहता हुआ झरना मानो प्रकृति का कोई शाश्वत संगीत गा रहा था। पानी की कल-कल ध्वनि केवल कानों तक सीमित नहीं थी, बल्कि दिल की धड़कनों के साथ मिलकर एक अनोखी लय बना रही थी। झरना जब ऊँचाई से नीचे गिरता, तो छोटे-छोटे जलकण आसमान में उड़कर इंद्रधनुषी रंगों की छटा बिखेर देते। यह दृश्य देखकर राहुल पाण्डेय दंग रह गए। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि जीवन की उस मासूम हँसी की वापसी थी जो कहीं बचपन की यादों में खो गई थी।

*रूपनाथ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान*

रूपनाथ केवल प्राकृतिक सौंदर्य का स्थल नहीं, बल्कि इतिहास और आस्था से भी जुड़ा है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह स्थान धार्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहाँ के आसपास फैले प्राचीन शिलालेख और चट्टानों पर उकेरे गए चिन्ह इस बात का प्रमाण हैं कि सदियों से यह स्थान साधकों, संतों और यात्रियों का केन्द्र रहा है। रूपनाथ का झरना उन स्थानों में गिना जाता है जहाँ प्रकृति और अध्यात्म का संगम होता है। यहाँ आने वाला हर यात्री केवल दर्शक नहीं रहता, बल्कि साधक बन जाता है। जैसे ही जलकण चेहरे पर पड़ते हैं, मन अपने आप ही भीतर की यात्रा पर निकल पड़ता है।

*प्रकृति का अद्भुत संगीत*

झरने से गिरता जल मानो सारंगी की झंकार हो, पेड़ों की सरसराहट बांसुरी की मधुर ध्वनि, और पक्षियों की चहचहाहट मृदंग की थाप। यह पूरा दृश्य एक ऐसा प्राकृतिक संगीत सम्मेलन रचता है जिसमें श्रोता कोई और नहीं बल्कि स्वयं आगंतुक होता है। राहुल पाण्डेय जी को यह अनुभव ऐसा लगा मानो बचपन की वह हँसी, वह बेफिक्री, और वह निर्मल आनंद वापस लौट आया हो। उनकी आँखें बार-बार उसी ओर खिंचतीं जहाँ पानी पत्थरों से टकराकर श्वेत धुएँ-सा दृश्य बना रहा था।

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