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फोटो तक सीमित जनसंपर्क चुनावी मौसम में नेताओं की प्राथमिकताओं पर उठते सवाल, नेता सिर्फ फोटो के लिए या जनता के लिए, चुनाव में जनता देगी जवाब, गरीबों से दूरी, कार्यकर्ताओं से नजदीकी कैसा जनप्रतिनिधित्व, चुनाव में याद आती है जनता, बाकी समय सिर्फ पार्टी, क्या नेता सिर्फ वोट के समय ही जनता के होते हैं, जनता नहीं, सिर्फ पार्टी, लोकतंत्र का यह कैसा चेहरा,फोटो से फुर्सत मिले तो जनता की सुध लें जनप्रतिनिधि नेता किसके गरीबों के या सिर्फ अपनी पार्टी के, वोट से पहले जनता, वोट के बाद कार्यकर्ता, जनता के दरवाज़े कब पहुंचेंगे जनप्रतिनिधि, चुनाव में याद रखें आपका वोट, आपका अधिकार

 फोटो तक सीमित जनसंपर्क


चुनावी मौसम में नेताओं की प्राथमिकताओं पर उठते सवाल, नेता सिर्फ फोटो के लिए या जनता के लिए, चुनाव में जनता देगी जवाब, गरीबों से दूरी, कार्यकर्ताओं से नजदीकी कैसा जनप्रतिनिधित्व, चुनाव में याद आती है जनता, बाकी समय सिर्फ पार्टी, क्या नेता सिर्फ वोट के समय ही जनता के होते हैं, जनता नहीं, सिर्फ पार्टी, लोकतंत्र का यह कैसा चेहरा,फोटो से फुर्सत मिले तो जनता की सुध लें जनप्रतिनिधि नेता किसके गरीबों के या सिर्फ अपनी पार्टी के, वोट से पहले जनता, वोट के बाद कार्यकर्ता, जनता के दरवाज़े कब पहुंचेंगे जनप्रतिनिधि, चुनाव में याद रखें आपका वोट, आपका अधिकार



कटनी  |  चुनावी सरगर्मियां तेज होते ही क्षेत्र में नेताओं की आवाजाही बढ़ गई है। गांव-गांव, वार्ड-वार्ड में गाड़ियों के काफिले पहुंच रहे हैं, स्वागत द्वार सज रहे हैं, माला और गुलदस्ते तैयार हो रहे हैं। कैमरों की चमक और सोशल मीडिया पर पोस्टों की बाढ़ के बीच एक सवाल आम लोगों की जुबान पर है क्या नेता वास्तव में जनता से मिलने आते हैं या सिर्फ फोटो खिंचवाने और अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से औपचारिक मुलाकात के लिए स्थानीय नागरिकों का कहना है कि जब भी कोई बड़ा नेता क्षेत्र में आता है, तो उसका कार्यक्रम पहले से तय रहता है। कुछ चुनिंदा कार्यकर्ताओं के घर चाय-नाश्ता, पार्टी कार्यालय में बैठक और मंच से भाषण यही आम दृश्य बन चुका है। लेकिन क्या कभी किसी गरीब परिवार के घर जाकर उनकी समस्याएं सुनी गईं? क्या किसी ऐसे घर में नेता पहुंचे जहां हाल ही में कोई अनहोनी हुई हो? यह प्रश्न अब खुलकर पूछे जाने लगे हैं।

*जनसंपर्क या जनप्रदर्शन*

ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले कई लोगों का आरोप है कि नेताओं का जनसंपर्क अब “जनप्रदर्शन” बनकर रह गया है। जैसे ही काफिला पहुंचता है, पहले से जुटी भीड़, मंच पर भाषण और उसके बाद फोटो सेशन। सोशल मीडिया पर तस्वीरें अपलोड होते ही यह संदेश दिया जाता है कि नेता ने जनता के बीच समय बिताया। परंतु स्थानीय लोगों का कहना है कि वास्तविक संवाद का समय बहुत कम होता है।एक बुजुर्ग किसान ने बताया, नेता जी हमारे गांव आए, लेकिन सीधे पार्टी कार्यकर्ता के घर गए।वहां बैठक हुई, फोटो खिंची और फिर चले गए। हम जैसे सामान्य लोग तो दूर से ही देखते रह गए।

*गरीबों के घर तक पहुंच कब*

क्षेत्र के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि कोई नेता वास्तव में जनता की नब्ज समझना चाहता है, तो उसे बिना सूचना के गरीब बस्तियों में जाना चाहिए। वहां बैठकर लोगों की समस्याएं सुननी चाहिए पानी, बिजली, सड़क, राशन, रोजगार और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर बात करनी चाहिए। हाल ही में क्षेत्र की एक बस्ती में एक गरीब परिवार के मुखिया का निधन हो गया। परिजनों का आरोप है कि उन्हें किसी जनप्रतिनिधि का सांत्वना संदेश तक नहीं मिला। जबकि उसी सप्ताह पार्टी के एक कार्यक्रम में नेताओं की उपस्थिति दर्ज की गई। ऐसे उदाहरण लोगों के मन में यह धारणा मजबूत कर रहे हैं कि नेताओं की प्राथमिकता आम जनता नहीं, बल्कि संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक समीकरण हैं।

*क्या केवल कार्यकर्ता ही महत्वपूर्ण*

राजनीति में कार्यकर्ताओं की भूमिका अहम होती है। वे ही पार्टी की रीढ़ माने जाते हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि बाकी जनता गौण हो जाए? कुछ लोगों का मानना है कि नेताओं की बैठकों में आम नागरिकों को बोलने का अवसर ही नहीं मिलता। मंच पर पार्टी पदाधिकारी, पीछे कार्यकर्ता और आम जनता दूर खड़ी रहती है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लोकतंत्र में हर मतदाता समान है चाहे वह किसी पार्टी का कार्यकर्ता हो या सामान्य नागरिक। यदि नेताओं की पहुंच केवल अपने समर्थकों तक सीमित रह जाए, तो लोकतांत्रिक भावना कमजोर पड़ सकती है।

*चुनाव के समय याद आती है जनता*

क्षेत्र में चर्चा है कि चुनाव नजदीक आते ही नेताओं की सक्रियता अचानक बढ़ जाती है। जिन गलियों में वर्षों तक कोई जनप्रतिनिधि नजर नहीं आया, वहां अचानक सभाएं और जनसंपर्क अभियान शुरू हो जाते हैं। लोगों का कहना है कि विकास कार्यों की समीक्षा और समस्याओं के समाधान की प्रक्रिया निरंतर होनी चाहिए, न कि केवल चुनावी मौसम में। एक युवा मतदाता ने कहा, “जब वोट चाहिए होता है तो नेता हर घर पहुंचते हैं। लेकिन जीत के बाद आम लोगों से मिलना मुश्किल हो जाता है। इस बार हमें सोच-समझकर निर्णय लेना होगा।

*वोट किसे और क्यों*

जनता के बीच यह भी चर्चा है कि क्या केवल पार्टी के कार्यकर्ताओं को ही नेताओं को वोट देना चाहिए क्या आम जनता की भूमिका केवल मतदान तक सीमित रह गई है लोकतंत्र में वोट देना अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी।इसलिए मतदाताओं से अपील की जा रही है कि वे भावनाओं या दिखावे के आधार पर नहीं, बल्कि काम और जवाबदेही के आधार पर निर्णय लें।राजनीतिक जागरूक नागरिकों का कहना है कि मतदाता को यह देखना चाहिए कि पिछले पांच वर्षों में उनके क्षेत्र में क्या ठोस काम हुए। क्या समस्याओं का समाधान हुआ? क्या जनप्रतिनिधि नियमित रूप से जनता के बीच पहुंचे? क्या उन्होंने संकट के समय साथ दिया?

 *जनता ही असली ताकत*

लोकतंत्र की असली शक्ति जनता है। नेता जनता के प्रतिनिधि होते हैं, शासक नहीं। यदि जनप्रतिनिधि केवल पार्टी के दायरे में सिमट जाएं और आम लोगों से दूरी बना लें, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। चुनाव नजदीक हैं। ऐसे में मतदाताओं के सामने अवसर है कि वे अपने अनुभवों के आधार पर निर्णय लें। यह याद रखना होगा कि वोट केवल एक बटन दबाने की क्रिया नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की दिशा तय करने वाला निर्णय है। क्षेत्र की जनता अब यह चाहती है कि नेता केवल कैमरे के सामने नहीं, बल्कि उनके आंगन में बैठकर भी संवाद करें। केवल मंच से नहीं, बल्कि चौपाल पर भी सुनें। और केवल कार्यकर्ताओं के घर नहीं, बल्कि हर उस घर तक पहुंचें जहां उम्मीद अब भी जिंदा है। आने वाला चुनाव इस बात की परीक्षा होगा कि जनता दिखावे को प्राथमिकता देती है या वास्तविक जनसेवा को। निर्णय अब मतदाताओं के हाथ में है।

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