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शीश माता-पिता को झुकाते रहो, चाहे भगवान की पूजा करो न करो

शीश माता-पिता को झुकाते रहो,

चाहे भगवान की पूजा करो न करो



कटनी  |  भारत की परंपरा में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है “मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः।” इसका अर्थ यह नहीं कि माता-पिता देवता हैं, बल्कि यह कि देवताओं के समान आदर, श्रद्धा और सेवा के अधिकारी हैं।जिस प्रकार मंदिर में प्रवेश से पहले मन शुद्ध किया जाता है, उसी प्रकार माता-पिता के सामने अहंकार, क्रोध और स्वार्थ को त्याग देना चाहिए । उनका आशीर्वाद ही जीवन का सबसे बड़ा संबल बनता है। माता वह पहली गुरु होती है, जो बच्चे को बोलना, चलना और समझना सिखाती है। पिता वह छाया होता है, जो धूप में तपते जीवन को ठंडक देता है। उनकी नींदें हमारी पढ़ाई के लिए कुर्बान होती हैं, उनकी इच्छाएँ हमारी जरूरतों के सामने मौन हो जाती हैं। उन्होंने हमें जीवन दिया, पाला-पोसा, संस्कार दिए यह ऋण किसी पूजा-पाठ, व्रत-उपवास या दान-दक्षिणा से चुकाया नहीं जा सकता। इसलिए कहा गया है कि चाहे कोई भगवान की पूजा करे या न करे, पर माता-पिता का सम्मान अवश्य करे यही सच्ची भक्ति है।आज के समय में आधुनिकता और भागदौड़ भरी जिंदगी ने रिश्तों की गर्माहट को ठंडा कर दिया है। लोग बड़े-बड़े मंदिरों में घंटों पूजा करते हैं, पर घर में बैठे माता-पिता की ओर देखने का समय नहीं निकाल पाते।मोबाइल, सोशल मीडिया और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ इतनी हावी हो गई हैं कि अपनों की आवाज़ अनसुनी रह जाती है।ऐसे में यह पंक्ति हमें झकझोरती है क्या हमारी पूजा सार्थक है, यदि हमारे घर के देवता उपेक्षित हैं? ईश्वर की पूजा विश्वास पर आधारित है। कोई करता है, कोई नहीं यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता है।लेकिन माता-पिता का सम्मान समाज और मानवता की बुनियाद है। जो व्यक्ति अपने जन्मदाताओं का आदर नहीं कर सकता, वह किसी भी धर्म, पूजा या सिद्धांत का सच्चा अनुयायी नहीं हो सकता। क्योंकि करुणा, सहानुभूति और कृतज्ञता का पहला पाठ हमें माता-पिता से ही मिलता है। इतिहास और पुराणों में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहाँ माता-पिता की आज्ञा और सम्मान को सर्वोपरि माना गया।भगवान राम ने पिता की आज्ञा के लिए राजपाट त्याग दिया।श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता की सेवा को ही जीवन का उद्देश्य बना लिया। इन कथाओं का मूल संदेश यही है कि माता-पिता की सेवा में ही जीवन की सिद्धि है।जब हम उनके चरणों में सिर झुकाते हैं, तो वास्तव में हम अपने अहंकार को झुकाते हैं और यही आत्मिक उन्नति का मार्ग है। माता-पिता केवल हमारे अतीत नहीं, हमारा वर्तमान और भविष्य भी हैं। उनके अनुभव हमारे लिए दीपक की तरह हैं, जो अंधेरे रास्तों में रोशनी दिखाते हैं। युवा अवस्था में हमें लगता है कि हम सब कुछ जानते हैं, पर समय के साथ समझ आता है कि माता-पिता की सीख कितनी अमूल्य थी। उनका हर डाँटना, हर समझाना हमारे भले के लिए होता है। इसलिए उनका सम्मान केवल औपचारिक नहीं, हृदय से होना चाहिए। आज आवश्यकता है कि हम पूजा-पाठ और आडंबर से ऊपर उठकर व्यवहारिक धर्म को अपनाएँ। माता-पिता के साथ समय बिताना, उनकी बात सुनना, उनकी जरूरतों का ध्यान रखना यही वास्तविक साधना है।उनके चेहरे की मुस्कान, उनका संतोष, उनका आशीर्वाद ये सब किसी भी मंदिर की घंटियों से अधिक पवित्र हैं। यदि हमारे कारण उनके मन में शांति है, तो समझिए कि हमारी पूजा स्वीकार हो गई। यह भी सत्य है कि हर माता-पिता पूर्ण नहीं होते। उनसे भी भूलें होती हैं, मतभेद होते हैं। परंतु सम्मान का अर्थ अंधी सहमति नहीं, बल्कि धैर्य, संवाद और संवेदना है। उनके दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करना, उनके प्रति कृतज्ञ रहना यही संस्कारों की पहचान है। जब हम उन्हें सम्मान देते हैं, तो हमारी आने वाली पीढ़ी भी हमसे वही सीखती है। अंततः यह पंक्ति हमें जीवन का सरल, पर गहरा सूत्र देती है ईश्वर की खोज मंदिरों में हो या न हो, पर माता-पिता का आदर हर हाल में होना चाहिए। क्योंकि जिस घर में माता-पिता का सम्मान होता है, वहाँ अपने-आप सकारात्मक ऊर्जा, शांति और समृद्धि का वास होता है। वहाँ ईश्वर को आने के लिए अलग से बुलाना नहीं पड़ता। इसलिए, शीश माता-पिता को झुकाते रहो, चाहे भगवान की पूजा करो न करो। क्योंकि माता-पिता के चरणों में झुका हुआ सिर ही जीवन की सबसे ऊँची पूजा है, और उनका आशीर्वाद ही सबसे बड़ा प्रसाद।


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