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कटनी में पदस्थ बीईओ ऑफिस में फैज़ अहमद संविदा लिपिक की नियुक्ति नियमों को ताक पर रखकर हुआ खेल, जांच हुई तो खुलेंगे बड़े राज

 कटनी में पदस्थ बीईओ ऑफिस में फैज़ अहमद संविदा लिपिक की नियुक्ति नियमों को ताक पर रखकर हुआ खेल, जांच हुई तो खुलेंगे बड़े राज



कटनी  |  मध्यप्रदेश में शिक्षा विभाग हमेशा चर्चा में रहा है। एक ओर जहां सरकार शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार खत्म करने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर विभागीय कार्यालयों से आए दिन ऐसे समाचार सामने आते हैं जो पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर देते हैं।खासकर संविदा नियुक्तियाँ, जिन्हें बेरोजगार युवाओं के लिए अवसर माना जाता है, वे ही भ्रष्टाचार और मनमानी का अड्डा बन गई हैं। कटनी जिले के बीईओ ऑफिस में पदस्थ संविदा लिपिक फैज़ अहमद की नियुक्ति का मामला भी इसी तरह का है। आरोप है कि उनकी नियुक्ति नियमों और प्रक्रिया को ताक पर रखकर की गई। अगर इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच हो, तो कई ऐसे राज सामने आ सकते हैं जो यह साबित करेंगे कि संविदा नियुक्तियाँ पारदर्शी नहीं बल्कि “संपर्क और सिफारिश तंत्र” पर आधारित होती जा रही हैं।

*बीईओ ऑफिस और उसकी भूमिका*

बीईओ ऑफिस किसी भी ब्लॉक की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी होता है। यहाँ से प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों की निगरानी होती है। शिक्षकों की नियुक्ति, पदस्थापना, वेतन, छात्रों की योजनाएँ, मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, शैक्षिक गतिविधियाँ और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन इसी कार्यालय से नियंत्रित होता है। ऐसे में इस दफ्तर में काम करने वाला लिपिक महज एक छोटा कर्मचारी नहीं होता, बल्कि उसकी जिम्मेदारी बड़ी होती है। फाइलें तैयार करना, कागज़ी कार्यवाही, आहरण-वितरण से जुड़े दस्तावेज़, बिल पास करना, इन सभी कामों में लिपिक की भूमिका अहम होती है। इसी वजह से इस पद पर नियुक्ति पूरी तरह नियमसम्मत और पारदर्शी होनी चाहिए।

*फैज़ अहमद की नियुक्ति का मामला*

मिली जानकारी और चर्चाओं के अनुसार, फैज़ अहमद को बीईओ ऑफिस में संविदा लिपिक के पद पर नियुक्त किया गया, लेकिन यह नियुक्ति सामान्य प्रक्रिया से अलग और नियमविरुद्ध प्रतीत होती है। नियुक्ति से पहले सार्वजनिक विज्ञापन देना आवश्यक है, ताकि सभी इच्छुक उम्मीदवार आवेदन कर सकें। परंतु यहाँ यह प्रक्रिया अधूरी रही। कहा जा रहा है कि चयन की मेरिट लिस्ट या तो जारी नहीं हुई या उसमें गड़बड़ी की गई। संविदा पदों पर नियुक्ति से पहले इंटरव्यू या दस्तावेज़ सत्यापन अनिवार्य है। यहाँ यह औपचारिकता नाम मात्र की रही। नियुक्ति आदेश तक को गुप्त रखा गया और केवल चुनिंदा लोगों को ही जानकारी दी गई।संविदा नियुक्ति की वैधानिक प्रक्रिया

मध्यप्रदेश शासन के नियमों के अनुसार , संविदा पदों की भर्ती खुली और पारदर्शी प्रक्रिया से होगी।विज्ञापन, आवेदन, दस्तावेज़ सत्यापन, मेरिट लिस्ट, चयन और आदेश ये सभी चरण अनिवार्य हैं।आरक्षण नीति का पालन आवश्यक है। संबंधित कार्यालय को पूरी प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। अगर इन चरणों का पालन नहीं हुआ, तो यह नियुक्ति स्वतः ही संदिग्ध और नियमविरुद्ध मानी जाएगी।

*अनियमितताओं की आशंका*

फैज़ अहमद की नियुक्ति में जो बातें सामने आई हैं, वे संकेत देती हैं कि यह नियुक्ति पूरी तरह से “जुगाड़ और दबाव” पर आधारित है। संभव है कि राजनीतिक दबाव या ऊँची पहुँच का इस्तेमाल हुआ हो। यह भी संभव है कि अधिकारियों ने आर्थिक लाभ लेकर नियुक्ति दी हो। अन्य योग्य उम्मीदवारों के साथ न्याय नहीं हुआ। अगर निष्पक्ष जांच होती है तो इन अनियमितताओं की परतें खुल सकती हैं और यह स्पष्ट हो जाएगा कि किसने किस स्तर पर नियमों की अनदेखी की।

*जिम्मेदार अधिकारी संदेह के घेरे में*

बीईओ ऑफिस की जिम्मेदारी सीधे तौर पर ब्लॉक शिक्षा अधिकारी और उनके अधीनस्थ स्टाफ पर आती है।नियुक्ति आदेश किसके हस्ताक्षर से निकला? चयन समिति में कौन शामिल था? जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) को क्या जानकारी थी? इन सभी सवालों का जवाब केवल एक विस्तृत जांच से ही मिल सकता है।

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