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आरोग्य मंदिर की नई बिल्डिंग में रिसाव, गुणवत्ता पर सवाल और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर गहराता संकट, ठेकेदार के ऊपर होना चाहिए कार्यवाही, कमीशन की खुलना चाहिए पोल आखिर कौन - कौन अधिकारी के पास गया पैसा

 आरोग्य मंदिर की नई बिल्डिंग में रिसाव, गुणवत्ता पर सवाल और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर गहराता संकट, ठेकेदार के ऊपर होना चाहिए कार्यवाही, कमीशन की खुलना चाहिए पोल आखिर कौन - कौन अधिकारी के पास गया पैसा



कटनी |  ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता और उनकी गुणवत्ता लंबे समय से चिंता का विषय रही है। सरकार ने बीते वर्षों में "आयुष्मान भारत" जैसी योजनाओं के तहत गाँव-गाँव तक उप-स्वास्थ्य केंद्र और आरोग्य मंदिर पहुँचाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई, ताकि ग्रामीण अंचल में रहने वाले लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएँ नज़दीक ही मिल सकें। मगर सवाल यह है कि यदि इन स्वास्थ्य केंद्रों का निर्माण ही घटिया सामग्री और लापरवाही से किया जाए, तो क्या ये वास्तव में अपने उद्देश्य को पूरा कर पाएँगे? रीठी विकासखंड की ग्राम पंचायत उमरिया में हाल ही में नवनिर्मित आयुष्मान आरोग्य मंदिर की इमारत इस सवाल को बेहद गंभीरता से सामने लाती है।महज़ कुछ महीने पहले तैयार हुई यह इमारत पहली ही बारिश में लीक करने लगी, छत से पानी टपकने लगा और मरीजों तथा स्वास्थ्यकर्मियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। यह घटना न केवल निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर गहरे सवाल खड़े करती है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की जड़ों को खोखला करने वाले भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की ओर भी इशारा करती है। ग्राम पंचायत उमरिया में स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से आयुष्मान आरोग्य मंदिर का निर्माण हाल ही में कराया गया। इस उप-स्वास्थ्य केंद्र की बिल्डिंग कुछ ही माह पहले पूर्ण हुई और ग्रामीणों ने उम्मीद की थी कि अब उन्हें बुनियादी चिकित्सा सेवाओं के लिए दूर-दराज़ नहीं जाना पड़ेगा।लेकिन पहली ही बरसात ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया। छत से पानी रिसने और टपकने की शिकायतें आने लगीं। मरीज जब इलाज के लिए पहुँचे तो उन्हें इलाज से ज़्यादा इस बात की चिंता रही कि कहाँ बैठें ताकि सिर पर पानी की बूँदें न गिरें। स्वास्थ्य कर्मियों ने भी शिकायत की कि विभागीय कार्य बाधित हो रहे हैं और दवाइयों से लेकर जरूरी उपकरण तक पानी से खराब होने की कगार पर पहुँच गए। यह स्थिति केवल असुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे मरीजों के इलाज और संक्रमण फैलने का खतरा भी बढ़ गया है।

*निर्माण कार्य की गुणवत्ता और जिम्मेदारी*

सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर कुछ ही महीनों पहले बनी बिल्डिंग में इतनी बड़ी खामी कैसे आ गई? यह स्थिति तभी संभव है जब निर्माण कार्य में गुणवत्ता मानकों की घोर अनदेखी की गई हो। ग्रामीणों का आरोप है कि ठेकेदार ने विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से सस्ती और घटिया सामग्री का उपयोग किया। सीमेंट, रेत और सरिया तक की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया।दीवारों पर प्लास्टर और छत की लेयरिंग में लापरवाही बरती गई, जिससे पानी रोकने का पर्याप्त प्रावधान ही नहीं रहा। अगर निर्माण मानकों का ईमानदारी से पालन हुआ होता, तो इतनी जल्दी बिल्डिंग में रिसाव जैसी गंभीर समस्या सामने नहीं आती। यह सीधे-सीधे लापरवाही और भ्रष्टाचार का मामला है।

*ठेकेदार और विभागीय मिलीभगत के आरोप*

गाँव के लोगों का मानना है कि ठेकेदार अकेले इतना बड़ा खेल नहीं कर सकता था। उसके साथ विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत भी रही होगी। निर्माण की निगरानी करने वाले अधिकारियों ने यदि सही समय पर निरीक्षण किया होता, तो खामियाँ सामने आ जातीं और उन्हें सुधारा जा सकता था। लेकिन यहाँ उल्टा हुआ। ठेकेदार ने जल्दीबाज़ी में काम पूरा कर लिया और अधिकारियों ने आँख मूँदकर काम की "पूर्णता रिपोर्ट" पास कर दी। परिणाम यह हुआ कि सरकारी खजाने से लाखों रुपए खर्च करके एक ऐसी बिल्डिंग खड़ी हो गई जो पहली बारिश में ही दम तोड़ने लगी।

*बरसात ने खोली पोल*

बरसात हमेशा किसी भी निर्माण की असली परीक्षा होती है। उमरिया के आरोग्य मंदिर की बिल्डिंग इस परीक्षा में बुरी तरह फेल हो गई। जैसे ही बारिश हुई, छत से पानी टपकने लगा। फर्श पर पानी जमा हो गया। दवाइयों के डिब्बे गीले हो गए और कुछ उपकरण खराब होने लगे।स्वास्थ्यकर्मियों के लिए मरीजों को बैठाना भी मुश्किल हो गया। कई मरीज इलाज बीच में छोड़कर लौट गए क्योंकि उन्हें लगा कि ऐसी जगह इलाज कराना उनके स्वास्थ्य के लिए और हानिकारक हो सकता है।

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