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खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं) भारत का बिजनेस माॅडल है इलेक्शन युद्ध के दौरान पूंजी नहीं बढती

 खरी-अखरी(सवाल उठाते हैं पालकी नहीं) 


  भारत का बिजनेस माॅडल है इलेक्शन 

      युद्ध के दौरान पूंजी नहीं बढती 



जब पहलगाम पर आतंकी हमला हो रहा था उस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी साउदी अरब में थे। घटना के अगले दिन वे दिल्ली आये जरूर लेकिन सीधे बिहार रवाना हो गए वहां से मुंबई फिर केरल की यात्रा पर निकल गए लेकिन अभी तक उन्हें पहलगाम जाने का समय नहीं मिला ठीक वैसे ही जैसे उन्हें अभी तक मणिपुर जाने का टाइम नहीं मिला। शायद ये किसी को याद नहीं होगा। तो फिर 1971,1984, 1999, 2002 कोई मायने नहीं रखते हैं। लोग पहले वर्षों का जिक्र करते थे फिर महीने पर उतर आए और अब दिनों का जिक्र करने लगे हैं।


अमेरिका को इस बुध्द ज्ञान की प्राप्ति हो गई है कि किसी भी देश की पूंजी युद्ध के दिनों में बढ नहीं सकती और चाइना ये बुध्द ज्ञान बहुत पहले ही प्राप्त कर चुका है शायद इसीलिए वह दुनिया के किसी भी युद्ध में शामिल नहीं हुआ। वह अपनी विस्तारवादी नीति पर बेखौफ़ चलता रहता है। लेकिन अमेरिका हर युध्द में शामिल रहा है। अब जब उसे ज्ञान प्राप्त हुआ है तो वह गुणा-भाग करने में लग गया है कि यूक्रेन को इतना दिया, इजराइल को इतना देना पड़ेगा तो उसने तय किया कि क्यों नहीं इन सब चीजों को बंद कर दिया जाए और बिजनेस माडल अपनाया जाए इसीलिए अमेरिकी राजनयिकों के बोल युद्ध की जगह बिजनेस पर सुनाई दे रहे हैं। शायद यही कारण है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी भारतीय बिजनेस माडल का अनुकरण करते हुए दिखाई दे रहे हैं। भारत का सबसे बड़ा बिजनेस है इलेक्शन यानी चुनाव। अगर आप इलेक्शन जीत गये तो कोई दिक्कत होने वाली नहीं है क्योंकि देश की पूरी इकोनॉमी, कानून, बिजनेस चुनी हुई सत्ता के इर्दगिर्द चलता है। अगर कार्पोरेट सत्ता के करीब है तो फिर कोई भी नियम कानून कार्पोरेटर पर लागू नहीं होते हैं। 


वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 4 तरह के देश होते हैं पहला लो इनकम देश, दूसरा लोवर मिडिल देश, तीसरा अपर मिडिल देश और चौथा है हाई इनकम देश। दुनिया में भारत को लोवर मिडिल देश माना गया है। वैसे तो भारत को लो इनकम वाले देशों में होना चाहिए क्योंकि माना गया है कि वह देश गरीब की श्रेणी में आयेगा जिसकी प्रतिदिन की कमाई 3.65 डालर प्रतिव्यक्ति होगी तो वह देश गरीब माना जाना जाएगा। भारत में जो प्रति व्यक्ति आय निकाली जाती है उसमें उन 20 टापमोस्ट कार्पोरेटर की आय जोड दी जाती है जिनकी इनकम 80-20 के दायरे में आती है। देश की 80 फीसदी आबादी पर 20 टाप कॉर्पोरेटस की कमाई भारी पड़ रही है। इस असमानता पर सरकार का कहना है कि सब कुछ कार्पोरेट्स ही तो कर रहे हैं। सरकार बताती है कि 2017-18 में जो वर्कर पापुलेशन रेशियो 46.8 फीसदी था वह आज की तारीख में 60 फीसदी हो गया है यानी इतने लोगों को रोजगार चाहिए। सरकार यह भी कह रही है कि हम इसमें से आधे से ज्यादा लोगों को रोजगार दे पाने की स्थिति में नहीं हैं। 


भले ही दुनिया के सबसे गरीब देशों की तुलना में भारत के तकरीबन 100 करोड़ लोग आकर खड़े हो जाएं लेकिन सरकार की अमीरी तो रेड कार्पेट पर चलते हुए कार्पोरेट के लिए कार्पोरेट के जरिए देश की जनता से उसी कार्पोरेट्स के अनुकूल माहौल बनाना है जिस कार्पोरेट्स को वह कह रही है कि तुम ना रहोगे तो देश डूब जायेगा। सरकार का काम उस रेड कार्पेट को उठाकर उस जमीन को देखना नहीं है जहां पर जनता अपने लहूलुहान नंगे पैरों से चल नहीं सकती है। जब सरकार कार्पोरेट्स को बचाने में लग जाएगी तो फिर पहलगाम क्यों याद आयेगा। जहां तक पहलगाम घटना को लेकर जनता में आक्रोश की बात है तो उसको भाषणों के जरिए ठंडा कर देंगे, क्योंकि कार्पोरेट्स डर के साये में जी नहीं सकता है और किसी भी देश के भीतर पूंजी युद्ध के वक्त बढ नहीं सकती है। 


दिल्ली के भारत मंडपम में युवाओं को संबोधित करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने विकसित भारत का जिक्र करते हुए कहा कि समय सीमित है, लक्ष्य बड़ा है (उपस्थित जनों को लगा कि पीएम ये बात पहलगाम को लेकर कह रहे हैं, मगर उपस्थित जनों की भावनाओं को समझते हुए पीएम ने तत्काल स्पष्ट कर दिया कि नहीं-नहीं ऐसा बिल्कुल मत सोचिएगा)। उन्होंने कानपुर आईआईटी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (आईटी) हब बनाने का भी जिक्र किया । जबकि आईआईटी कानपुर के कुछ प्रोफेसर्स ने आफ द रिकार्ड बताया कि इस दौर में सरकार द्वारा केवल और केवल उन्हीं टापिक पर रिसर्च के लिए अनुदान दिया जाता है जो बीजेपी की राजनीति के लिए अनुकूल होते हैं। 


भारत के इकोनॉमिक सर्वे 2024-25 के मुताबिक दिहाड़ी मजदूरों को मिलाकर पुरुषों की मासिक आय 16260 रुपये यानी 542 रुपये रोज है वहीं महिलाओं की मासिक आय 9930 रुपये यानी 331 रुपये रोज है। दिहाड़ी मजदूरों की आय घटा दी जाय तो फिर पुरुषों की आमदनी 19020 रुपये मासिक यानी 634 रोज तथा महिलाओं की 10980 रुपये मासिक यानी 366 रुपये रोज होती है। इसमें भी वर्गीकरण किया जाय तो नियमित कर्मचारी हैं उनमें पुरुषों को 736 रुपये रोजाना मतलब 22080 रुपये माहवार एवं महिलाओं को 550 रुपये रोजाना मतलब 16500 रुपये माहवार मिलता है। इसी तरह से स्वरोजगार वाले पुरुष की कमाई 535 रुपया रोज (15090 रुपया महीना), महिला की कमाई 183 रुपया रोज (5490 रुपया महीना) होती है। 


इकोनॉमी सर्वे में तो ग्रामीण और शहरी भारत का भी जिक्र किया गया है। उस लिहाज से देखें तो ग्रामीण भारत में पुरुषों की कमाई 13907 रुपये महीना यानी 463 रुपये हर रोज, महिलाओं की कमाई 4907 रुपये महीना यानी 163 रुपये हर रोज़ इसी तरह से शहरी भारत के पुरुष 22930 रुपया महीना मतलब 764 रुपया हर दिन, महिला 8489 रुपया महीना मतलब 283 रुपया हर दिन कमाती है। हकीकत तो यह है कि देश के भीतर किसी भी क्षेत्र में काम करने वाला व्यक्ति औसतन 500 रुपये रोज भी कमाने की स्थिति में नहीं है। पालतू मीडिया किस तरह से एक तस्वीर दिखाकर छद्म राष्ट्रवाद को उभारता है और दूसरी तस्वीर को (जो मोदी सत्ता के असली चेहरे को उजागर करता है उसे) छुपाता है का जिक्र करना भी प्रासंगिक होगा। एक ओर गोदी मीडिया ने गंगा एक्सप्रेस वे पर मिराज और फाइटर प्लेन को ठीक उसी समय उतरते हुए दिखाया जिस समय केरल के तिरुवनंतपुरम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गौतम अडानी के पोर्ट को देखते हुए कह रहे थे कि बड़ा शानदार पोर्ट बनाया है वह नहीं दिखाया। 


जरा सोचिए कि देश के टाप 20 कार्पोरेट्स की कमाई में 2014 से 2025 के बीच कितने फीसदी बढोत्तरी हुई है और सरकार जिन कामों को करने का ढिंढोरा पीटती है उसमें कितने फीसदी खर्च किया गया है कार्पोरेट्स के नेटवर्थ के मुकाबले। मसलन 4 करोड़ लोगों को पीएम आवास, 12 करोड़ लोगों को शौचालय, 10 करोड़ लोगों को एलपीजी, 4 करोड़ लोगों को बिजली कनेक्शन, 80 करोड़ लोगों को 5 किलो मुफ्त अनाज, 10-12 करोड़ किसानों को किसान सम्मान निधि,। एक तरफ 90-95 करोड़ और दूसरी ओर कुल जमा केवल 20 लोग। सरकार की प्राथमिकता तो यही दिखती है कि कार्पोरेट्स के लिए भारत को कुचला जाय, उसके लिए नीतियां बनाई जाय और इस सबसे जनता का ध्यान भटकाने के लिए जरूरी है उसे सड़क पर अठखेलियाँ करते हुए मिराज, फाइटर प्लेन दिखाये जायें तथा बतलाया जाय कि अभी तो राफेल की अगली खेप आने वाली है, अमेरिका से भी एफ 30 विमान की डील फाइनल होने ही वाली है, रशिया के साथ भी हथियार खरीदने का सौदा हो गया है। 


अश्वनी बडगैया अधिवक्ता 

स्वतंत्र पत्रकार

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