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हिसाब होगा हर एक आंसू का, हिसाब होगा हर एक गोली का सिर्फ आतंकी ही नहीं, वो भी नहीं बख्शे जाएंगे जो पर्दे के पीछे से इस नापाक हरकत में आतंकियों का साथ दे रहे हैं

 हिसाब होगा हर एक आंसू का, हिसाब होगा हर एक गोली का सिर्फ आतंकी ही नहीं, वो भी नहीं बख्शे जाएंगे जो पर्दे के पीछे से इस नापाक हरकत में आतंकियों का साथ दे रहे हैं



ढीमरखेड़ा |  "हिसाब होगा हर एक आंसू का, हिसाब होगा हर एक गोली का" यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि उन मासूम लोगों की चीख है जो आतंकवाद के कारण अपने अपनों को खो चुके हैं। यह उन शहीद जवानों की कसम है जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। यह उन नागरिकों का प्रण है जो अब चुप नहीं रहेंगे। आतंकवाद सिर्फ एक सीमा पार से आया खतरा नहीं है, यह एक मानसिकता है, एक षड्यंत्र है, जिसमें कुछ चेहरे सामने होते हैं और कई पर्दे के पीछे छिपे होते हैं।

*आतंकवाद एक वैश्विक संकट, लेकिन भारत की विशेष पीड़ा*

भारत दशकों से आतंकवाद का शिकार रहा है, चाहे वह 1993 का मुंबई बम धमाका हो, 2001 में संसद पर हमला हो, 2008 का 26/11 हमला हो या पुलवामा की भयावह घटना। इन सबका मकसद एक ही था  भारत को कमजोर करना, भारतीय समाज में डर पैदा करना और राजनीतिक अस्थिरता फैलाना। लेकिन भारत ने हर बार जवाब दिया, कभी सीमा पर, कभी कूटनीतिक मंचों पर।

*आंसुओं का हिसाब*

जब एक माँ अपने बेटे को तिरंगे में लिपटा देखती है, जब एक पत्नी अपने सुहाग को खो देती है, जब एक बच्चा अपने पिता की तस्वीर को देखकर सवाल करता है "पापा कब आएंगे?" तब हर आंसू एक कहानी कहता है। ये आंसू गवाह हैं कि यह सिर्फ सीमा पर की लड़ाई नहीं है, यह भारत की आत्मा पर हमला है। और इस बार भारत ठान चुका है हर आंसू का हिसाब होगा। 

*गोली का जवाब गोली से*

भारतीय सुरक्षा बल अब पहले की तरह नहीं सोचते। "पहले गोली खाओ, फिर सोचो" की नीति अब बदल चुकी है। अब "जहां से गोली आए, वहीं तक जाकर जवाब दो" यही नीति है। सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक इस बदली हुई सोच का उदाहरण हैं। सेना को अब खुली छूट है कि वो कब, कहां और कैसे जवाब दे इसका निर्णय वो खुद ले सकते हैं।

*पर्दे के पीछे बैठे गद्दार*

आतंकी सिर्फ सीमा पार से नहीं आते, कई बार वे यहीं हमारे बीच पलते हैं। कुछ लोग पैसे के लिए, कुछ राजनीति के लिए, तो कुछ अपनी विचारधारा के नाम पर इस देश के खिलाफ काम करते हैं। ये वही लोग होते हैं जो आतंकियों को पनाह देते हैं, सूचना लीक करते हैं, नकली दस्तावेज़ बनाते हैं, और उन्हें 'सहानुभूति' के नाम पर मासूम दिखाने की कोशिश करते हैं। अब वक्त आ गया है कि इन चेहरों को बेनकाब किया जाए।

*राजनीति और आतंकवाद मौन समर्थन का अपराध*

जब कोई नेता यह कहता है कि आतंकवाद की कोई जात या धर्म नहीं होती, यह सच है। लेकिन जब वही नेता किसी आतंकी की मौत पर मानवाधिकार की दुहाई देता है और शहीदों की चुपचाप शवयात्रा गुजर जाती है, तब यह सवाल उठता है — क्या मानवाधिकार केवल आतंकियों के लिए हैं? पर्दे के पीछे से दिया गया यह समर्थन, देश की आत्मा को भीतर से खोखला करता है।

*मीडिया की भूमिका सच और भ्रम के बीच संघर्ष*

मीडिया का काम है जनता को सच्चाई दिखाना। लेकिन जब कुछ चैनल TRP की दौड़ में आतंकियों को 'गनमैन', 'मिलिटेंट', 'यूथ' कहने लगते हैं, जब आतंकवादियों की मौत को 'एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल किलिंग' कहा जाता है, तब यह समझना ज़रूरी हो जाता है कि कौन सच दिखा रहा है और कौन झूठ को चमकदार बना रहा है।

*विदेश नीति भारत की नई आक्रामक रणनीति*

अब भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी चुप नहीं रहता। संयुक्त राष्ट्र हो या G20, भारत आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक समर्थन जुटाने में सफल रहा है। पाकिस्तान को FATF की ग्रे लिस्ट में डालना हो या दुनिया के बड़े देशों को भारत की आतंकवाद विरोधी नीति के पक्ष में खड़ा करना यह नई कूटनीतिक ताकत का ही परिणाम है।अब भारत सिर्फ जवाब नहीं देता, भारत अब रणनीति बनाता है। आतंकियों के आर्थिक नेटवर्क को तोड़ना, सोशल मीडिया पर फैलाए जाने वाले नरेटिव्स को जवाब देना, और आतंकियों के 'ह्यूमन शील्ड' के पीछे छिपे चेहरे उजागर करना यह सब नई नीति का हिस्सा है।

*सामाजिक चेतना देशभक्ति की नई परिभाषा*

अब देशभक्ति सिर्फ तिरंगा लहराने या राष्ट्रगान गाने तक सीमित नहीं है। अब देशभक्ति है अपने आस-पास के संदिग्ध तत्वों की सूचना देना, सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे देशविरोधी कंटेंट का विरोध करना, और यह सुनिश्चित करना कि आतंकी मानसिकता हमारे समाज में पनप न सके। बदलाव की रीढ़

देश का युवा अब सिर्फ सोशल मीडिया पर नहीं लड़ रहा, वो अब जमीनी स्तर पर जागरूकता अभियान चला रहा है। NCC, NSS, और विभिन्न छात्र संगठनों ने देशप्रेम को नया आकार दिया है। वे जानते हैं कि आज अगर हम चुप रहे तो कल हमारा अस्तित्व संकट में होगा।

*कानूनी कार्रवाई गद्दारों के खिलाफ सख्ती*

अब NIA, ED, और अन्य एजेंसियों को खुली छूट है कि वे आतंकवाद के नेटवर्क को तोड़ें  चाहे वो बैंक खातों के माध्यम से फंडिंग हो, हवाला नेटवर्क हो, या फिर NGO के नाम पर चल रहे देश विरोधी अभियान। UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) जैसे कानून अब मजबूती से लागू किए जा रहे हैं। देश की जनता अब समझ चुकी है कि सच्चा मज़हब आतंकवाद नहीं सिखाता। जब कोई गद्दार आतंकी की मौत पर रोता है और शहीद जवान की मृत्यु पर चुप रहता है, तब अब लोग सवाल उठाते हैं। जनता अब सवाल करती है आप किसके साथ हैं? देश के या देशद्रोहियों के?

 *अंत की शुरुआत हो चुकी है*

अब भारत बदल रहा है। यह वह भारत नहीं जो सिर्फ सहता था, यह वह भारत है जो जवाब देता है, जो गिनती करता है हर एक आंसू की, हर एक गोली की। अब सिर्फ आतंकियों का नहीं, बल्कि गद्दारों का भी हिसाब होगा। पर्दे के पीछे छिपे हर दुश्मन को उजागर किया जाएगा। यह लड़ाई लंबी है, लेकिन अब यह तय है जीत भारत की होगी।

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