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भगवान परशुराम जयंती पर उमरियापान में निकली भव्य शोभायात्रा ब्राह्मण समाज की एकता का परिचायक

 भगवान परशुराम जयंती पर उमरियापान में निकली भव्य शोभायात्रा ब्राह्मण समाज की एकता का परिचायक



ढीमरखेड़ा |  भगवान परशुराम, जो विष्णु के छठवें अवतार के रूप में माने जाते हैं, ब्राह्मणों के गौरव और धर्म की रक्षा के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका जन्मोत्सव संपूर्ण भारत में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है, लेकिन उमरियापान की शोभायात्रा अपने भव्य आयोजन, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक झलकियों के लिए विशेष प्रसिद्ध है।इस वर्ष भी भगवान परशुराम जन्मोत्सव के पावन अवसर पर उमरियापान में एक भव्य शोभायात्रा का आयोजन किया गया, जो बड़ी माई मंदिर से आरंभ होकर नगर के प्रमुख स्थानों से होते हुए पुनः बड़ी माई मंदिर में आकर संपन्न हुई। यह शोभायात्रा न केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति थी, बल्कि ब्राह्मण समाज की एकजुटता, सामाजिक समर्पण और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बन गई।

*झांकियों का आकर्षण और आध्यात्मिक वातावरण*

इस शोभायात्रा की विशेष बात थी भगवान परशुराम, भगवान श्रीराम एवं लक्ष्मण जी की भव्य और जीवंत झांकियाँ। इन झांकियों को देखने के लिए उमरियापान के साथ-साथ आस-पास के गांवों से भी लोग बड़ी संख्या में आए। परशुराम जी की झांकी में उन्हें फरसा धारण किए हुए देखा गया, जो अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना का प्रतीक बना। वहीं भगवान श्रीराम और लक्ष्मण जी की झांकी में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्शों की झलक दिखी। झांकियों के साथ चल रहे भजन मंडली और ढोल-नगाड़ों की धुनों ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। महिलाएं कलश यात्रा में पारंपरिक वेशभूषा में सम्मिलित रहीं, तो बच्चे श्रीराम और परशुराम की पोशाक में नज़र आए। फूलों की वर्षा और भगवा ध्वजों से सजी सड़कें किसी तीर्थ स्थान का आभास करा रही थीं।

*ब्राह्मण समाज की गरिमामयी उपस्थिति*

इस आयोजन की सबसे उल्लेखनीय बात थी ब्राह्मण समाज की बड़ी संख्या में भागीदारी। समाज के प्रमुख लोगों ने न केवल आयोजन में भाग लिया, बल्कि इसके सफल संचालन में भी अहम भूमिका निभाई। प्रमुख उपस्थित जनों में अश्वनी शुक्ला, विजय दुबे, सतीश गौतम, दिलीप वाजपेई, कमलेश पौराणिक, शैलेंद्र पौराणिक, मनीष मिश्रा, राजू गर्ग, पंकज तिवारी, राहुल पाण्डेय, अनूप दुबे, रमेश पाण्डेय, ओमकार शर्मा, अजीत पाण्डेय, संतोष दुबे, आनंद मिश्रा, ललित गौतम, रामकिशोर पाण्डेय, रमन शुक्ला, प्रमोद गौतम, वीरेंद्र गर्ग, संतोष त्रिपाठी, संजय पाण्डेय, सतीश गौतम, राहुल दुबे, अमित गर्ग, नरेंद्र त्रिपाठी, सत्यम पाण्डेय, मोहित पाण्डेय, रोहित पाण्डेय एवं पंकज त्रिपाठी की सक्रिय भागीदारी रही। इन सभी लोगों ने न केवल उपस्थिति दर्ज कराई, बल्कि परशुराम जयंती को सामाजिक जागरूकता के मंच के रूप में भी प्रयोग किया। उनके वक्तव्यों में समाज में व्याप्त बुराइयों से लड़ने, एकजुट होकर समाज हित में कार्य करने और युवा पीढ़ी को अपने धर्म और संस्कृति से जोड़ने का संदेश भी निहित था।

*बड़ी माई मंदिर श्रद्धा और ऊर्जा का केंद्र*

शोभायात्रा का प्रारंभ और समापन बड़ी माई मंदिर से हुआ। यह मंदिर न केवल धार्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण है, बल्कि स्थानीय संस्कृति का भी केंद्र है। शोभायात्रा के समापन पर मंदिर परिसर में भव्य आरती और प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया। यहां संतों और विद्वानों ने भगवान परशुराम के जीवन पर प्रवचन दिए और उनके आदर्शों को अपनाने की अपील की।

*सांस्कृतिक कार्यक्रम और सम्मान समारोह*

शोभायात्रा के समापन के उपरांत एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें स्थानीय कलाकारों ने रामचरितमानस के अंशों पर आधारित नाट्य प्रस्तुतियाँ दीं। परशुराम के जीवन से जुड़ी घटनाओं को नृत्य-नाटिका के माध्यम से प्रस्तुत किया गया, जिससे युवाओं को प्रेरणा मिली। इस अवसर पर ब्राह्मण समाज के वरिष्ठ नागरिकों और समाजसेवियों को सम्मानित भी किया गया। विशेष रूप से शिक्षकों, समाजसेवकों और धार्मिक आयोजनों में योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित कर युवा पीढ़ी को सेवा और समर्पण की प्रेरणा दी गई।

*युवाओं की भूमिका धर्म और जागरूकता का संबल*

इस आयोजन में युवाओं की भूमिका भी अत्यंत सराहनीय रही। उन्होंने झांकियों की तैयारी, शोभायात्रा के मार्ग में व्यवस्था, स्वच्छता अभियान और प्रचार-प्रसार में बढ़-चढ़कर भाग लिया। यह देखकर यह स्पष्ट होता है कि परशुराम जी जैसे आदर्श पुरुषों की जयंती केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्जागरण का माध्यम बनती जा रही है। युवा वर्ग ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस आयोजन को व्यापक स्तर पर प्रचारित किया। लाइव प्रसारण, वीडियो डॉक्यूमेंटेशन और ऑनलाइन कवरेज के माध्यम से देश-विदेश तक उमरियापान की शोभायात्रा की गूंज सुनाई दी।

*एकता का संदेश ब्राह्मण समाज का पुनर्जागरण*

भगवान परशुराम की शोभायात्रा न केवल धार्मिक आयोजन थी, बल्कि ब्राह्मण समाज की एकजुटता, गौरव और आत्मबल को दर्शाने वाला सशक्त मंच भी थी। यह आयोजन इस बात का प्रतीक बन गया कि जब समाज एकत्र होता है, तो वह अपनी संस्कृति की रक्षा और विकास के लिए कोई भी कार्य कर सकता है। यह शोभायात्रा केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि ब्राह्मण समाज के आत्मसम्मान और संगठन का जीवंत उदाहरण बन गई। यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाता है कि अपने आराध्य और संस्कृति के प्रति श्रद्धा रखना और समाज के लिए एकजुट रहना कितना आवश्यक है।भगवान परशुराम जयंती पर उमरियापान में निकली शोभायात्रा ने धार्मिक आस्था, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत किया। झांकियों की भव्यता, लोगों की विशाल उपस्थिति, युवाओं की सहभागिता और समाज के प्रमुख जनों की सक्रिय भागीदारी ने इस आयोजन को अविस्मरणीय बना दिया। इस शोभायात्रा के माध्यम से ब्राह्मण समाज ने न केवल भगवान परशुराम को श्रद्धांजलि दी, बल्कि अपने समाज को संगठित, सशक्त और जागरूक बनाने का संदेश भी दिया।

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