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नरवाई जलाना , एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या, सरकार जो भी प्रावधान लाती हैं वह आपके हित में होता हैं समझदारी से करे कार्य न जलाएं नरवाई प्रदूषण के चलते जीव जंतु भी मौत के मुंह में समा रहे हैं

 नरवाई जलाना , एक गंभीर पर्यावरणीय समस्या, सरकार जो भी प्रावधान लाती हैं वह आपके हित में होता हैं समझदारी से करे कार्य न जलाएं नरवाई प्रदूषण के चलते जीव जंतु भी मौत के मुंह में समा रहे हैं 



ढीमरखेड़ा |  भारत में कृषि प्रधानता होने के कारण बड़े पैमाने पर फसल कटाई होती है, जिसके बाद खेतों में फसल अवशेष जैसे नरवाई (धान, गेहूं, ज्वार, मक्का आदि की डंठलें) खेत में बच जाती हैं। कई किसान खेत की अगली फसल की तैयारी के लिए इन फसल अवशेषों को जलाने का आसान और सस्ता तरीका अपनाते हैं। लेकिन यह तरीका जितना सस्ता है, उतना ही हानिकारक भी है। यह न केवल वायु प्रदूषण को बढ़ाता है, बल्कि मृदा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य, और जैव विविधता को भी नुकसान पहुंचाता है।

*वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि*

नरवाई जलाने से सबसे बड़ा नुकसान वायुमंडल को होता है। जब किसान फसल अवशेष जलाते हैं, तो उसमें से कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄), नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O), कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5 और PM10) तथा अन्य विषैली गैसें निकलती हैं। ये गैसें वायुमंडल में जाकर धुंध और स्मॉग का निर्माण करती हैं। इससे दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश आदि राज्यों में सर्दियों के समय प्रदूषण का स्तर खतरनाक स्थिति में पहुंच जाता है।

*मृदा पर दुष्प्रभाव*

नरवाई जलाने से मृदा में उपस्थित जैविक पदार्थ (Organic Matter) जलकर नष्ट हो जाते हैं। यही जैविक पदार्थ मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने में सहायक होते हैं। इसके अलावा मृदा में मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव, जैसे केंचुए, नाइट्रोजन फिक्सिंग बैक्टीरिया, फंगस और अन्य जैविक घटक भी मर जाते हैं। इन जीवों के मरने से मिट्टी में पोषक तत्वों का चक्र टूट जाता है और फसल की उत्पादकता पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

*केंचुओं की मृत्यु और जैविक सक्रियता में कमी*

केंचुए मृदा को भुरभुरा, हवादार और पोषक तत्वों से भरपूर बनाते हैं। लेकिन जब खेतों में नरवाई जलाई जाती है, तो सतही तापमान इतना बढ़ जाता है कि ये जीव मर जाते हैं। इससे मिट्टी की जलधारण क्षमता, सजीवता और पोषण संतुलन पर नकारात्मक असर होता है। इसके चलते लंबी अवधि में खेत बंजर होने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

 *पर्यावरणीय असंतुलन*

नरवाई जलाने से न केवल खेत, बल्कि आसपास के पूरे पर्यावरण पर असर पड़ता है। इससे वनों में अग्निकांड का खतरा बढ़ता है, पक्षियों और जानवरों का निवास क्षेत्र प्रभावित होता है और जैव विविधता में कमी आती है। यह एक प्रकार से पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित करने का कार्य है।

*मानव स्वास्थ्य पर असर*

फसल अवशेष जलाने से उत्पन्न धुएं में PM2.5 और PM10 जैसे सूक्ष्म कण होते हैं, जो सीधे मानव श्वसन तंत्र में जाकर अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हृदय रोग और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बनते हैं। बच्चों और वृद्धजनों पर इसका असर और भी घातक होता है।

 *कानूनी दायित्व और जुर्माने का प्रावधान*

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) और पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा फसल अवशेष जलाने को गैरकानूनी करार दिया गया है। छोटे किसान  ₹2,500 तक जुर्माना मध्यम किसान ₹5,000 तक जुर्माना बड़े किसान  ₹15,000 या अधिक जुर्माना इन आदेशों के पीछे उद्देश्य केवल सजा देना नहीं, बल्कि जागरूकता फैलाना और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।

*फसल अवशेष का वैकल्पिक उपयोग*

(i) जैविक खाद (नाडेप, वर्मी कंपोस्ट)

कृषि विभाग द्वारा किसानों को सलाह दी गई है कि वे फसल अवशेष को खाद बनाने में इस्तेमाल करें। नाडेप खाद और वर्मी कंपोस्ट के माध्यम से न केवल मृदा की उर्वरता बढ़ती है, बल्कि खेत की जलधारण क्षमता भी बेहतर होती है। इससे उत्पादन में भी सुधार आता है।

(ii) जुताई द्वारा मिट्टी में मिलाना

किसानों को बताया गया है कि वे रोटावेटर या मल्चर जैसी मशीनों से फसल अवशेषों को खेत में जुताई कर मिट्टी में मिला सकते हैं। इससे यह हरी खाद के रूप में कार्य करता है और खेत को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखता है।

(iii) बायो-डिकंपोजर का प्रयोग

दिल्ली सरकार द्वारा विकसित बायो-डिकंपोजर तकनीक से फसल अवशेषों को कुछ ही दिनों में जैविक खाद में बदला जा सकता है। यह विधि सस्ती, सरल और पर्यावरण के अनुकूल है।

 *सरकारी योजनाएं और मदद*

केंद्र और राज्य सरकारें प्रोत्साहन योजनाओं के तहत किसानों को मशीनें, अनुदान और प्रशिक्षण प्रदान कर रही हैं, स्ट्रॉ रीपर, हैप्पी सीडर, रोटावेटर, पैडी थ्रैशर जैसी मशीनों पर अनुदान। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा जागरूकता अभियान। "पराली मुक्त गांव" जैसे अभियान, जहां गांवों को आदर्श मॉडल बनाया जा रहा है।

 *टिकाऊ कृषि की ओर बढ़ते कदम*

फसल अवशेष जलाना केवल एक आदत नहीं, बल्कि अज्ञानता और विकल्पों की कमी का परिणाम है। यदि सही जानकारी, संसाधन और समर्थन किसानों को मिले, तो वे इस विनाशकारी आदत को त्याग सकते हैं। टिकाऊ कृषि की ओर बढ़ना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जहां प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, मृदा की उर्वरता, स्वस्थ पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य का संरक्षण सुनिश्चित किया जा सके।

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