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ढीमरखेड़ा एवं सिलौड़ी क्षेत्र में अवैध शराब पैकारियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही

 ढीमरखेड़ा एवं सिलौड़ी क्षेत्र में अवैध शराब पैकारियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही



ढीमरखेड़ा |  मध्यप्रदेश के कटनी जिले के ढीमरखेड़ा और सिलौड़ी क्षेत्र लंबे समय से अवैध शराब बिक्री की समस्या से जूझ रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अवैध शराब की पैकारी न केवल सामाजिक विकृति फैला रही थी, बल्कि इससे युवा पीढ़ी भी बर्बादी की ओर अग्रसर हो रही थी। इसके साथ ही महिलाओं, किसानों और आम नागरिकों का जीवन भी प्रभावित हो रहा था। जब शासन और प्रशासन की आँखों से यह समस्या ओझल होती प्रतीत हो रही थी, तभी सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी ने इस विषय पर संज्ञान लेते हुए प्रदेश के प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह को पत्र सौंपकर सिलौड़ी क्षेत्र में चल रही अवैध शराब पैकारी को बंद कराने की मांग की।

*मंत्री के हस्तक्षेप से जागी उम्मीदें*

20 अप्रैल 2025 को प्रभारी मंत्री के अल्प प्रवास के दौरान जब सिलौड़ी मंडल अध्यक्ष मनीष बागरी ने उन्हें यह पत्र सौंपा, तो यह केवल एक औपचारिक कार्यवाही नहीं थी। इसके पीछे वर्षों की पीड़ा, स्थानीय जनता की तकलीफें, और समाज को शराब के प्रभाव से मुक्त करने की तड़प थी। मंत्री ने इस पर गंभीरता से विचार करते हुए तत्काल संबंधित विभाग को निर्देशित किया। इसके बाद जिला आबकारी अधिकारी विभा मरकाम और सहायक जिला आबकारी अधिकारी चंद्रभान कोरी ने मिलकर एक ठोस रणनीति तैयार की।

*आबकारी विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया*

प्रभारी मंत्री से निर्देश प्राप्त होते ही जिला आबकारी अधिकारी ने तत्काल कार्यवाही के आदेश दिए। चंद्रभान कोरी के मार्गदर्शन में के.के. पटैल, आबकारी उपनिरीक्षक के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई। इस टीम ने सिलौड़ी एवं ढीमरखेड़ा क्षेत्र के आसपास के गाँवों में दबिश देना प्रारंभ किया। जिन गाँवों को विशेष रूप से चिन्हित किया गया, उनमें ठिर्री, पिड़रई, नेगई, घाना एवं दशरमन शामिल थे। कार्यवाही के दौरान टीम को गुप्त सूत्रों से मिली जानकारी के आधार पर विभिन्न स्थानों पर छापेमारी की गई। इस दौरान कुल 100 पाव देशी शराब जप्त की गई, जिसमें 21 पाव देशी मंदिरा मसाला और 79 पाव देशी मंदिरा प्लेन शामिल थीं। इनकी अनुमानित बाजार कीमत लगभग 8025 रुपये आंकी गई है। हालांकि कीमत चाहे जितनी भी हो, असली नुकसान सामाजिक और स्वास्थ्य स्तर पर हो रहा था, जिसे रोकना आवश्यक था।

*पैकारियों में हड़कंप*

इस अचानक हुई कार्यवाही से शराब माफियाओं और पैकारियों में हड़कंप मच गया। जो लोग अब तक स्थानीय तंत्र की कमजोरियों का फायदा उठाकर शराब बेच रहे थे, वे अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। कार्यवाही की खबर जंगल में आग की तरह फैली और आसपास के गाँवों में भय का माहौल बन गया। यह डर, कानून का डर था जो समाज के हित में जरूरी था।

*स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भूमिका*

मनीष बागरी जैसे जनप्रतिनिधियों की सक्रियता ने यह साबित कर दिया कि जब स्थानीय नेता वास्तव में जनता की चिंता करते हैं, तो बदलाव संभव है। उन्होंने केवल पत्र सौंपा ही नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया पर लगातार निगरानी रखी और अधिकारियों से संपर्क बनाए रखा। उनकी इस प्रतिबद्धता से जनता में भरोसा जगा है कि जनप्रतिनिधि उनकी समस्याओं के लिए संघर्षरत हैं।

*कार्यवाही में शामिल अधिकारियों की भूमिका*

इस सफल कार्यवाही के पीछे कई अधिकारियों और कर्मचारियों की मेहनत है। के.के. पटैल ने न केवल टीम का नेतृत्व किया, बल्कि सूचनाओं को एकत्रित कर सटीक रणनीति बनाई। चंद्रप्रकाश त्रिपाठी, उमेश मिश्रा और प्रदीप कुशवाहा ने भी अभूतपूर्व सहयोग दिया। ये सभी अधिकारी अपने दायित्व को सिर्फ एक नौकरी की तरह नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी की तरह निभा रहे हैं।

*स्थानीय जनता की प्रतिक्रिया*

जब यह कार्यवाही हुई तो ग्रामीणों में हर्ष और संतोष की भावना उत्पन्न हुई। वर्षों से अवैध शराब के कारण परेशान महिलाएं, जिनके घरों में हिंसा और गरीबी फैल रही थी, उन्होंने राहत की सांस ली। युवा वर्ग जो इस बुराई के शिकार हो रहे थे, उनके परिजनों को भी उम्मीद की किरण दिखी। कई महिलाओं ने अधिकारियों का धन्यवाद करते हुए कहा कि अब उन्हें अपने बच्चों के भविष्य को लेकर थोड़ी राहत मिली है।

*शराब माफियाओं के खिलाफ स्थायी लड़ाई*

हालांकि यह कार्यवाही एक बड़ा कदम है, लेकिन यह लड़ाई अभी पूरी नहीं हुई है। जैसे ही एक स्थान से शराब माफिया हटते हैं, वे दूसरे स्थान पर जड़ें जमाने की कोशिश करते हैं। इसलिए आबकारी विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि कार्यवाही सतत जारी रहेगी। के.के. पटैल ने कहा है कि वे नियमित रूप से क्षेत्रों में निरीक्षण करेंगे और कहीं भी अवैध गतिविधियों की सूचना मिलते ही तत्काल कार्यवाही की जाएगी।

*राजनीतिक इच्छाशक्ति का असर*

यह उदाहरण स्पष्ट करता है कि यदि जनप्रतिनिधि, मंत्री और अधिकारी मिलकर किसी सामाजिक बुराई के खिलाफ अभियान छेड़ें तो बदलाव संभव है। प्रभारी मंत्री उदय प्रताप सिंह के हस्तक्षेप के बिना शायद यह कार्यवाही इतनी तेज़ी से न हो पाती। इससे यह भी प्रमाणित होता है कि अच्छे नेतृत्व की मौजूदगी कितनी आवश्यक होती है।

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