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अरबों की वन भूमि पर खनन कारोबारी की नजर, रची जा रहीं साजिशें आरोप- वन अफसरों की मिलीभगत से खनन कारोबारी सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की तैयारी में है जिस जमीन का पट्टा अमान्य, उसे पास कराने जी तोड़ मेहनत कर रहे भ्रष्ट अफसर हजारों सागौन के जंगल से भरी अरबों की वनभूमि डकारना चाहता हैं कटनी का खनन कारोबारी आनंद गोयनका तहसील क्षेत्र ढीमरखेड़ा के ग्राम झिन्ना का मामला

 अरबों की वन भूमि पर खनन कारोबारी की नजर, रची जा रहीं साजिशें

आरोप- वन अफसरों की मिलीभगत से खनन कारोबारी सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की तैयारी में है

जिस जमीन का पट्टा अमान्य, उसे पास कराने जी तोड़ मेहनत कर रहे भ्रष्ट अफसर

हजारों सागौन के जंगल से भरी अरबों की वनभूमि डकारना चाहता हैं कटनी का खनन कारोबारी आनंद गोयनका

तहसील क्षेत्र ढीमरखेड़ा के ग्राम झिन्ना का मामला 



ढीमरखेड़ा |  मध्यप्रदेश के कटनी जिले के वन क्षेत्र ग्राम झिन्ना, तहसील ढीमरखेड़ा की 48.562 हेक्टेयर भूमि को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। आरोप है कि तकरीबन 120 एकड़ की इस वन भूमि पर कटनी के खनन कारोबारी आनंद गोयनका की नजर है। शायद इसलिए तो वन अफसरों की मिलीभगत से सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका वापस लेने की साजिशें रची जा रही हैं। इस संबंध में एक शिकायत मुख्यमंत्री को की गई थी। जिसकी जांच वन मंडल कटनी द्वारा की गई और जांच रिपोर्ट भोपाल स्थित वन भवन भेज दी गई है। 

*पहले पूरा मामला समझिए*

कटनी के खनन कारोबारी आनंद गोयनका मेसर्स सुखदेव प्रसाद गोयनका को मध्य प्रदेश की तत्कालीन दिग्विजय सरकार के कार्यकाल में 1994 से 2014 तक की अवधि के लिए 48.562 हेक्टेयर भूमि पर खनिज करने का पट्टा मिला था। लेकिन साल 2000 में वन मंडल अधिकारी कटनी के पत्र के आधार पर कलेक्टर कटनी ने आदेश पारित कर लेटेराइट फायर क्ले और अन्य खनिज के खनन पर रोक लगा दी थी और साल 1991-92 के दौरान सागौन का पौधारोपण किया गया था। लेकिन आरोप है कि अभी भी खनन कारोबारी की नजर इस जमीन पर बनी हुई है और वो इसे हासिल करने के लिए अफसरों के साथ मिलकर साजिश रच रहे हैं।

*सुप्रीम कोर्ट में है मामला*

आरोप ये भी है कि शासन ने जब इस वन भूमि पर खनन से रोक लगाई तो खनन माफिया ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का रुख किया। राजस्व अधिकारियों से सांठ-गांठ और दस्तावेजों में हेरफेर कर खनन कारोबारी हाईकोर्ट से राहत पाने में सफल रहे। हाईकोर्ट द्वारा प्रदान की गई राहत के खिलाफ शासन ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की, जो आज भी विचाराधीन है। खनन कारोबारी एक बार फिर मामले में सक्रियता दिखाते कुछ भ्रष्ट अफसरों से सांठ-गांठ कर सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका को वापस लेने की कोशिश में है।

*प्रदेश में सिर्फ ग्राम झिन्ना का सर्वे क्यों?*

सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित साधिकार समिति (सीईसी) द्वारा मध्य प्रदेश राज्य की सभी विवादित भूमियों का सर्वे कराकर जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया था। लेकिन खनन माफिया गोयनका बंधुओं ने वन विभाग के अधिकारियों से मिलीभगत कर सिर्फ ग्राम झिन्ना जिला कटनी का सर्वे कराया। आरोप लगाए जा रहे हैं कि करोड़ों रुपए का लेन-देन हुआ है। क्योंकि सर्वे सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मध्य प्रदेश में करने कहा है।

*निष्पक्ष जांच से सामने आएंगे असली चेहरे*

शिकायतकर्ता के मुताबिक यदि जिम्मेदार अफसरों की मंशानुसार शासन उक्त याचिका को सुप्रीम कोर्ट से वापस लेता है तो वन क्षेत्र में खनन से पर्यावरण पर बुरा असर पड़ेगा। साथ ही वन्य प्राणी भी विस्थापित होंगे। इस पेचीदा मामला में प्रदेश के वर्तमान वनमंत्री को भी अंधेरे में रखा गया है। अगर वास्तविक तथ्यों की सही जांच हो तो अनेक अधिकारियों का असली चेहरा सामने आ जाएगा।

*कमलनाथ सरकार ने किया अवैधानिक आदेश, अब भ्रष्ट अफसर दे रहे साथ*

सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका को वापस लेने के लिए 2018 की कमलनाथ सरकार ने अवैधानिक आदेश किया था। जिसमें तत्कालीन चीफ सेकेट्री एसआर मोहंती की बड़ी भूमिका रही। लेकिन प्रदेश में अचानक सत्ता परिवर्तन के बाद शिवराज सिंह चौहान ने सरकार बनाई और मामला वहीं थम गया। इसके बाद खनन कारोबारी एक बार फिर मामले में सक्रियता दिखाते कुछ भ्रष्ट अफसरों से सांठ-गांठ की और सुप्रीम कोर्ट में दायर विशेष अनुमति याचिका क्रमांक / 5353-5354 / 2017 को वापस लेने प्रयास किया। इसका भी आदेश जारी हो गया है। तत्कालीन भ्रष्ट कांग्रेस सरकार का साथ देते हुए वर्तमान में भी कुछ अधिकारी असत्य जानकारी भेज रहे हैं।

*वन भूमि का इतिहास*

ग्राम झिन्ना की भूमि जमींदारी उन्मूलन के बाद वन विभाग को वर्ष 1955 में 774.05 एकड़ भूमि प्रबंधन में मिली थी। जो वर्ष 1908-09 से 1948-49 तक जमींदार रायबहादुर खजांची, बिहारी लाल व अन्य के नाम दर्ज थी। जिसे 10 जुलाई 1958 की सूचना और एक अगस्त 1958 की प्रकाशन तिथि से संरक्षित वन घोषित किया गया। इसके बाद भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 4 की अधिसूचना क्रमांक डी-3390-3415-07-दस-3 दिनांक 24 सितम्बर 2007 प्रकाशन दिनांक 14 दिसम्बर 2007 से वनमंडल झिन्ना के अंतर्गत ग्राम झिन्ना के खसरा नम्बर 304, 333, 320 में कुल रकबा 153.60 एकड़ क्षेत्र अधिसूचित कर एसडीएम ढीमरखेड़ा को वन व्यवस्थापन अधिकारी नियुक्त किया गया। जो कि वन विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज है। वर्ष 2018-19 में एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा राजस्व प्रकरण क्रमांक / 011-19(4)/2018-19 में पारित आदेश दिनांक 18-9-2019 के अंतर्गत उल्लेख किया गया कि वादग्रस्त भूमि खसरा नम्बर 320 वर्ष 1906 से 1951 तक मालगुजारी की जमीन नहीं थी। एसडीएम ढीमरखेड़ा ( वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेश दिनांक 18-07-2008, 18-10- 2011 और 18-09-2019 को पारित प्रत्येक आदेश में उक्त भूमि को वन भूमि मानने से इंकार किया। जिसे कलेक्टर कटनी द्वारा अपने आदेश दिनांक 04-03-2010, 19-03- 2013 और 19-12-2019 के माध्यम से एसडीएम ढीमरखेड़ा (वन व्यवस्थापन अधिकारी) द्वारा पारित आदेशों के क्रियान्वयन पर रोक लगाई।

संपादक राहुल पाण्डेय - 9399291487

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