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कर्म का आश्रव निरंतर होता रहता है आश्रव को रोकना आसान नहीं

 कर्म का आश्रव निरंतर होता रहता है आश्रव को रोकना आसान नहीं

 


ढीमरखेड़ा | सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युगश्रेष्ठ आचार्य भगवन संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा प्रति समय परिणाम बंध होते हैं आत्मा में जीव के परिणाम निश्चित रूप से पूर्ववत कर्म के उदय को लेकर के और कर्मफल के कारण जो सामग्री है विशेष सामग्री उनके निमित्त को लेकर नए सिरे से परिणाम उत्पन्न होते हैं और कर्म का आश्रव निरंतर होता रहता है। उस आश्रव को रोकना आसान नहीं है । एक बात यह है आगम के अनुरूप हम सोचते हैं ऐसे संसार में अनंतानंत जीव है बिना पुरुषार्थ के उत्पन्न होते रहते

है इसलिए गुरुदेव ने स्वाध्याय के दौरान तत्व चर्चा के दौरान बात रखी है और बहुत यह निरंतर इस विषय को ध्यान में रखते हुए हमें चलना चाहिए जीव का जो विकास होता है वह बुद्धि पूर्वक ही होता है और अबुद्धिपूर्वक भी

जीव का विकास होता है और अंतर मुहूर्त में ऑटोमेटिक परिणाम में परिवर्तन होता रहता है। जिसको लेश्या भी कहते हैं और अंतर मुहूर्त परिवर्तनीय वह लेश्या होती है जिसके साथ संबंध रखने वाली योग की जो प्रवर्तनीय है उसका नाम लेश्या ऐसा आगम में उल्लेख मिलता इसलिए नहीं चाहते हुए भी यह परिणाम होंगे और निगोद पर्याय में जिस जीव का वास है जहां पर एक श्वास में 18 बार जन्म और मरण हो रहा है और निरंतर अनंत का संवेदन कर रहा है और यह कर्म फल चेतना की बात आती है वह कर्म नहीं कर सकता अर्थात बुद्धि पूर्वक उसकी कोई चेष्टा नहीं होती किंतु पूर्व में बंधा हुआ कर्म है वह उदय में आता तो उसका फल भोगना

अनिवार्य सिद्ध होता है वह फल निश्चित रूप से भोगेगा और प्रतिकार के भाव हो सकते हैं किंतु प्रतिकार वह चेष्टा के माध्यम से नहीं करता जैसा समझने के लिए एक वृक्ष खड़ा है भिन्न-भिन्न ऋतुओं में जो भी वातावरण निर्मित होता है उस बीच में वह खड़ा है वह दौड़ नहीं सकता देखा आपने वृक्ष दौड़ रहा हो यह बात अलग है रेल में बैठे तो लगता वृक्ष भाग रहे हैं किंतु वह अलग परिणति है वह वृक्ष भाग नहीं रहा दौड़ नहीं रहा एक कृषक है उसके हाथ में कुल्हाड़ी है वृक्ष काटने के उद्देश्य को लेकर उसके पास पहुंचा है। कुल्हाड़ी का वह प्रहार कर रहा है और प्रत्येक प्रहार का उस वृक्ष को संवेदन हो रहा है। अनंत दुख का संवेदन वह कर रहा है।

*हर जीव अपना कर्ता, नियंता और विधाता है*

गवान महावीर का जन्म उत्तरी बिहार में वैशाली के लिच्छवी जाति की गणतीय व्यवस्था में हुआ। वैशाली उस समय लिच्छवी जाति के क्षत्रियों का गौरवशाली गणतंत्र था। मतदान के लिए काले और लाल रंग की शलाकाओं का प्रयोग होता था बहुमत का निर्णय स्वीकार कर उसे सर्वसम्मति से क्रियान्वित कर दिया जाता था। यही कारण है कि महावीर के अंतःकरण पर गण की गरिमा व महिमा का गहरा प्रभाव रहा। महावीर आध्यात्मिक लोकतंत्र के शास्ता है। जहां समग्रता प्रथम चरण है। वे मनुष्य थे और मनुष्यत्व की संपूर्णता के लिए उन्होंने यह सब कुछ छोड़ा जिससे लोग ऐसे चिपके रहना चाहते हैं जैसे आज के राजनीतिज्ञ सत्ता व पद से ये जानते थे कि लोकतंत्र में लोक दृष्टा हैं, जो

दिखाई भी देते हैं और दिखने वाले भी होते हैं। दोनों ही लोक हैं। दोनों का ही साध्य साधन में छिपा है महावीर की सत्ता सर्वसाधारण की है, जहां विकास में सब भागीदार होते हैं तो त्याग में भी। महावीर के साथ मनुष्य जीवन का नया अध्याय शुरू होता है जिसमें हर जीवन संपूर्ण होता है। अपना स्वामी स्वयं होता है। उन्होंने ईश्वर का भी जनतंत्रीकरण कर दिया। ईश्वर की सार्वभौम सत्ता के साथ उनके सृष्टा या नियंता की जगह उन्होंने सर्वहितकारी, प्रियकारी व शिवकारी बना दिया। महावीर की अवधारणा में हर जीव अपना कर्ता नियंता और विधाता है। उसके स्वयं के कर्म उसे उन्नत करते हैं या गिराते है। जीवन सरल नहीं है, वह कठिन है, जहां निरंतर परीक्षा है। एक समय का प्रमाद समूचे जीवन को निगल जाता है। इसलिए जीवन से भागना पलायन है। वे कहते हैं- भागो मत, अपने को बदलो व्याख्या या विश्लेषण मत करो। मुनो सुनो और अपने में गुणते जाओ। सत्य बाहर नहीं होता भीतर ही होता है। भगवान महावीर का जीवन बोध अनवत प्रेरणा है। हर जीव जीना चाहता है। महावीर इस भाव को ही प्राणवान करते हैं। हर जीव को आत्मवत समझने को जीवन का आधार बनाते हैं। ये किसी भी प्रकार के स्वामित्व को हिंसा मानकर नकारते हैं।

*पत्रकार राहुल पाण्डेय*

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