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2009 के कम मतदान में कांग्रेस जीत गई थी शहडोल सीट! पिछले चुनाव की तुलना में 11 फीसद कम मतदान के क्या हैं मायने चिलचिलाती धूप का असर या मुद्दों से खफा लोग नही निकले घरों से

 2009 के कम मतदान में कांग्रेस जीत गई थी शहडोल सीट! पिछले चुनाव की तुलना में 11 फीसद कम मतदान के क्या हैं मायने चिलचिलाती धूप का असर या मुद्दों से खफा लोग नही निकले घरों से



 कटनी। पहले चरण के लिए एमपी की जिन 6 सीटों पर कल वोटिंग हुई,  उसमें शहडोल संसदीय क्षेत्र के मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। 2019 के पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में 11 फीसदी कम मतदान के मायने क्या हैं, इसको लेकर मंथन का दौर जारी है। राजनीति हलकों में सवाल तैर रहे हैं कि कहीं कम मतदान सत्ताधारी दल के लिए खतरे की घण्टी तो नही। मतदाताओं की उदासीनता आखिर क्या बयां कर रही है। अगर सबकुछ ठीक है और लोग मोदी सरकार के कामकाज से खुश हैं तो सरकार को यथावत रखने के लिए घरों से निकलने में उन्हें कौन सी परेशानी आ रही थी। इसके उलट बीजेपी समार्थितों का तर्क है कि अधिक मतदान हमेशा सत्ता पलटने के लिए होता है। वोटिंग ट्रेंड बता रहा है कि लोगों को मोदी सरकार के रहते कोई खास परेशानी नही।आंकड़ों पर एक नजर डाली जाए तो शहडोल संसदीय क्षेत्र के सभी आठ विधानसभा क्षेत्रों में कल हुए मतदान का औसत प्रतिशत 63.73 है जो 2019 के चुनाव से करीब 11 फीसदी कम है। पिछले चुनाव में इस संसदीय सीट पर 74.73 फीसद मतदाताओं ने लोकतंत्र के इस महायज्ञ में हिस्सा लिया था किंतु इस बार बढ़े हुए वोटों के बावजूद 11 फीसद मतदाताओं ने अपने अधिकार का उपयोग करने में रुचि क्यों नही दिखलाई। जानकारों की नजर में इसके अलग-अलग कारण हो सकते हैं। मतदान के दौरान चिलचिलाती धूप भी एक वजह मानी जा सकती है कि लोग घरों से निकले ही नही लेकिन ऐसी परिस्थितियां तो पिछले चुनाव में भी मौजूद थी, तब लोग अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए इतना उत्साहित क्यों थे। पिछले चुनाव में कमोवेश हर सीट पर मोदी लहर अपना असर दिखला रही थी, जिसकी वजह से मतदाता सीधे तौर पर बीजेपी की सरकार चुनने के लिए बड़ी तादात में घरों से निकले। क्या राम मंदिर की उपलब्धि और मोदी की गारंटी के परसेप्शन के बावजूद वैसे हालात नही, इसलिये मतदान कम हुआ। इसके अलावा इस आदिवासी सीट पर गरीबी, रोजगार और मजदूरों के पलायन का बड़ा मुद्दा प्रभावी है जिसमें पिछले पांच साल में कोई खास काम होता नही दिखा, इस वजह से इस चुनाव में मतदाताओं की उदासीनता सामने आई। बहरहाल जो भी हो, आंकड़ों ने सत्ताधारी दल को बेचैन कर दिया है। कांग्रेस के पास इस सीट पर खोने को कुछ नही। भाजपा की हिमाद्री सिंह ऐसी उम्मीदवार हैं, जिनकी टिकट रिपीट हुई है। क्या प्रत्याशी दोहराया जाना भी जनता की रुचि न होने की एक वजह बना। इस इलाके में आंकड़ों को जरा और बारीकी से समझें तो 2009 के चुनाव में जब केंद्र में कांग्रेस सरकार की वापसी हुई तब इस चुनाव में कांग्रेस की प्रत्याशी हिमाद्री सिंह की मां राजेश नन्दिनी सिंह चुनाव जीत गई थी। उस चुनाव में मतदान का प्रतिशत घटकर 49.74 रह गया था।  जबकि 2014 में मतदान प्रतिशत  बढ़कर 62.20 हुआ तो बीजेपी के दलपत सिंह परस्ते चुनाव जीत गए। साफ था कि जनता ने उस दौर की कांग्रेस प्रत्याशी को हटाने के लिए अधिक मतदान किया। हालांकि 2014 के इलेक्शन में मोदी लहर प्रभावी थी, जिसका फायदा बीजेपी को मिला। 2019 में मतदान में और अधिक उछाल आई। 74.73 प्रतिशत वोटिंग में हिमाद्री सिंह चुनाव जीत गईं। इस बार घटा प्रतिशत बीजेपी के माथे पर शिकन ला रहा है। अगर ऐसा है तो तीन बार के विधायक फुन्देलाल मार्को लोकसभा की सीढ़ियां चढ़ सकते हैं। इस सीट पर कटनी जिले के बड़वारा विधानसभा क्षेत्र की बात की जाए तो यहां के 299 मतदान केंद्रों पर मतदान का प्रतिशत 60.01 है, जो कुछ माह पहले हुए विधानसभा चुनाव से काफी कम है। विधानसभा चुनाव में बीजेपी के धीरेंद्र सिंह ने यहां करीब 51 हजार वोटों के साथ बड़ी जीत दर्ज की थी। क्या संसदीय सीट के लिए भाजपा की बड़वारा से यह हिस्सेदारी रहेगी।

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