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सिस्टम की नसों में घुलता ज़हर, फ़ाइलों में दफन सच, जब जिम्मेदार बने गुनहगार, रिश्वतखोरों का राज, पैसों की बारिश में भीगे अफसर, ईमान पर भारी पैसे की भूख, जनता परेशान और अफसर मालामाल, घूसखोरी की जड़ें गहरी कौन सी ताकतें दे रही संरक्षण, लक्षित योजनाओं में लूट वंचितों का हक़ खाया, अफसरों ने दौलत कमाई

 सिस्टम की नसों में घुलता ज़हर, फ़ाइलों में दफन सच, जब जिम्मेदार बने गुनहगार, रिश्वतखोरों का राज, पैसों की बारिश में भीगे अफसर, ईमान पर भारी पैसे की भूख, जनता परेशान और अफसर मालामाल, घूसखोरी की जड़ें गहरी कौन सी ताकतें दे रही संरक्षण, लक्षित योजनाओं में लूट वंचितों का हक़ खाया, अफसरों ने दौलत कमाई




कटनी  |  देश की प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे जनता की सेवा और कल्याण के लिए निर्मित किया गया था, आज उन्हीं लोगों की परेशानियों का कारण बनती जा रही है। कागज़ी फ़ाइलों की मोटी परतों में सच दबाकर रखने की कला, संपर्कों की चाबी से हर ताला खोलने का हुनर और पैसों की आवाज़ पर कार्रवाई की दिशा बदलने की प्रवृत्ति यही आज के सिस्टम की असली पहचान बनती जा रही है। सिस्टम की नसों में घुलता यह ज़हर केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की हत्या है।

*फ़ाइलों में दफ़्न सच और भ्रष्ट तंत्र की परतें*

देश भर के कार्यालयों में रोज़ाना हज़ारों फाइलें बनती, घूमती और अटकती हैं, पर इन फाइलों में वह सच दफन होता है, जो सार्वजनिक होना चाहिए। गरीबों की पात्रता सूची, योजनाओं की स्वीकृति, जमीनों की नाप-जोख, राशन कार्ड से लेकर पेंशन तक हर दस्तावेज़ की मंज़िल रिश्वत के दाम से तय होती दिखाई देती है। फ़ाइलें तभी आगे बढ़ती हैं जब उन पर एक अदृश्य ‘ग्रीस’ लगाई जाए और यह ‘ग्रीस’ है पैसा, जिसे अब साधन नहीं, बल्कि ‘पासपोर्ट’ की तरह देखा जाने लगा है। जो इसे दे सकता है वह आगे बढ़ जाता है, और जो नहीं दे सकता वह कक्षा में बैठे उस छात्र की तरह बैठा रह जाता है, जिसकी उपस्थिति कोई नहीं गिनता। 

 *जिम्मेदार ही बनें गुनहगार*

समस्या तब और गहरी होती है जब वही लोग, जिन्हें व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना था, खुद ही गुनहगारों की सूची में खड़े मिलते हैं। यह स्थिति केवल किसी एक विभाग या दफ्तर की नहीं है; यह सिस्टम स्तर पर फैली हुई बीमारी है। शिकायतें दर्ज करने से लेकर जांच पूरी करने तक हर स्तर पर भ्रष्टाचार की परछाई साफ देखी जा सकती है। पदों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी कभी-कभी अदृश्य सत्ता की तरह व्यवहार करने लगते हैं। वे न तो समय पर काम करते हैं, न ही वास्तविकता की परवाह करते हैं। लेकिन जब रिश्वत का लालच सामने आता है, तो वही अधिकारी अचानक फुर्तीले और सहयोगी बन जाते हैं। यह विडंबना है कि जनता जिन पर भरोसा करती है, वही उसकी उम्मीदों को तोड़ने का काम कर रहे हैं।

*रिश्वतखोरों का राज पैसों की बारिश में भीगे अफ़सर*

किसी भी कार्यालय में भ्रष्टाचार की बदबू महसूस करने के लिए ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती। जैसे ही कोई जरूरतमंद नागरिक किसी काम के लिए पहुंचता है, उससे पहले ही ‘किसको कितना देना है’ यह फॉर्मूला तय होता है। ऐसा लगता है कि एक समानांतर सत्ता चल रही हो, जिसका संविधान, न्याय और नियमों से कोई लेना-देना नहीं । पैसों की बारिश में भीगे अफसरों का एक पूरा वर्ग खड़ा हो गया है। वे जानते हैं कि प्रक्रिया की जटिलता जनता पर थोप दी जाए, तो लोग मजबूर होकर जेबें खाली कर देंगे। कई अधिकारी अपने पद को कमाई के साधन की तरह इस्तेमाल करते हैं, जैसे किसी दुकान का काउंटर हो जहां से हर काम की ‘रेट-लिस्ट’ तैयार है।

*ईमान पर भारी पैसे की भूख*

आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि ईमानदारी को कमजोरी समझा जाने लगा है। अधिकारियों के लिए भ्रष्टाचार एक स्वीकार्य ‘नॉर्म’ बन चुका है। जरा-सा दबाव, थोड़ी सी जिम्मेदारी, या किसी प्रक्रिया को तेज करने की कोशिश इन सबका एक ही जवाब है “काम तो हो जाएगा, लेकिन… थोड़ा ध्यान रखना पड़ेगा।” यही ध्यान रखना पड़ेगा वाली संस्कृति ने व्यवस्था को दीमक की तरह खा लिया है। ईमानदार कर्मचारी अलग-थलग पड़ जाते हैं, और बेईमानों की टोली मिलकर अपने हितों की सुरक्षा करती है। यह समूह इतना शक्तिशाली हो जाता है कि उसे कानून, नियम या कार्रवाई का भय भी कम ही लगता है।

*जनता परेशान, अफसर मालामाल*

जहाँ एक तरफ जनता एक-एक दस्तावेज़ के लिए चक्कर लगाती है, वहीं दूसरी तरफ कुछ अधिकारी उसी दस्तावेज़ को सोने की खान बना चुके हैं। पेंशन, आवास योजना, छात्रवृत्ति, सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ, नल-जल, सड़क निर्माण, राशन, भूमि - रिकॉर्ड किसी भी योजना का नाम ले लें, हर जगह कुछ लोग अपनी जेब गर्म करने का मौका ढूंढ लेते हैं।जनता की मेहनत की कमाई से चलने वाला यह सिस्टम उसी जनता को सबसे ज्यादा परेशान करता है। सुखद यह होता यदि अधिकारी कम से कम जनता के समय और परेशानी का मूल्य समझते। मगर उलटा हो रहा है अफसर मालामाल और जनता बेहाल की तस्वीर आम बात बनती जा रही है।

*घूसखोरी की जड़ें कौन सी ताक़तें दे रही संरक्षण*

भ्रष्टाचार सिर्फ एक व्यक्ति का काम नहीं होता। यह नेटवर्क बनाता है ऊपर से नीचे तक और कभी-कभी बाहर तक भी । यह नेटवर्क इतना मजबूत होता है कि एक-दूसरे को बचाता भी है और बढ़ावा भी देता है। घूसखोरी की जड़ें इतनी गहरी इसलिए हैं क्योंकि कुछ वरिष्ठ अधिकारी अपने अधीनस्थों की गलत हरकतों पर जानबूझकर आंखें मूंद लेते हैं।भ्रष्ट कर्मचारी की शिकायत होने पर भी कार्रवाई ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। राजनीतिक और बाहरी दबाव कभी-कभी भ्रष्ट को बचाने में मदद कर देते हैं। जनता की जागरूकता कम होने से भ्रष्ट लोगों को खुला मैदान मिल जाता है। जब तक इस पूरे संरक्षण तंत्र को नहीं तोड़ा जाता, तब तक भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना केवल एक सपना ही रहेगा।

*लक्षित योजनाओं में लूट वंचितों का हक़ खाया, अफसरों ने दौलत कमाई*

सरकारें गरीबों और वंचितों के लिए जितनी भी योजनाएँ चलाती हैं, उनका असली फायदा तभी मिलता है जब जमीन स्तर पर ईमानदारी हो। पर दुर्भाग्य से कई योजनाएँ कागज़ पर ही ‘पूरी’ हो जाती हैं। कागज़ में सड़क बन जाती है, जमीन पर गड्ढे वैसे ही रहते हैं।लाभार्थी सूची में नाम जुड़ जाते हैं, पर लाभार्थियों को कुछ नहीं मिलता। टॉयलेट बन जाते हैं, लेकिन सिर्फ फोटो में। पेंशन पास होती है, लेकिन बैंक तक पहुँचने से पहले कटौती हो जाती है। इन सबमें सबसे ज्यादा नुकसान उन लोगों का होता है, जो सच में जरूरतमंद हैं। जो पात्र हैं, वे वंचित हो जाते हैं; और जो अपात्र हैं, वे पैसों के बल पर लाभ ले लेते हैं।

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